शनिवार, 30 सितंबर 2017

अपने अंदर का रावण जलाया क्या?

देश रावण को जलाने में व्यस्त था। अपने अंदर की बुराइयों से पूरी तरह अनजान। नकाब ओढ़े हुए। किसी को कोई मतलब नहीं। हर साल की तरह इस साल भी बुराई का प्रतीक रावण जला दिया गया। राम की जीत हुई। कृपया राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ना समझें।

वैसे शुभकामनाओं का, बधाइयों का सिलसिला सुबह से चल रहा है। सिलसिला ही है, कोई इन पर अमल नहीं करता। भारी और बड़ा काम है। इसीलिए शब्द ही खानापूर्ति कर देते हैं। सिर्फ शब्द ही हैं, सरोकार नहीं। फिर इतना लिखने की वजह क्या है?
 बताना सिर्फ इतना है कि विजयदशमी के दिन, गांधी जी की जयंती से सिर्फ 2 दिन पहले #गुरुग्राम में बुराई (गंदगी) पर जीत हासिल करने उतरे 3 जवानों ने शहादत दे दी।

मेघनाथ, विभीषण और रावण के जलते पुतलों, बम-पटाखों के भयानक शोर के बीच उनकी चीखें कहीं दब गईं। किसी को कुछ भी सुनाई नहीं दिया। कंपनी के सीवर की सफाई करने उतरे तो 4 जवान थे, एक अभी जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहा है।
सब कुछ डिजीटल हो रहा है। हाइटेक हो रहा है। अब तीर नहीं, बटन से रावण जलते हैं।
सबसे ऊंचा रावण बनाने और जलाने की होड़ है। लेकिन भीतर के रावण का किसी को पता ही नहीं चलता। जब चलता है, तो कहते हैं-छोड़ न, सब चलता है।

रिंकू, राजकुमार और नन्हें की मौत पर कहीं आवाज नहीं है। सीवर की गंदगी ही उनके परिवार के भोजन का आधार थी। रावण के जल चुकने के बाद अब मैदान में सन्नाटा है। सड़कों पर भीड़ है। लेकिन रिंकू, राजकुमार और नन्हें जैसे शहीदों की परवाह किसे है ?
मेरी, आपकी, आपके रिश्तेदारों की, उनके रिश्तेदारों की गंदगी साफ करने वालों के लिए डिजिटल इंडिया कब होगा? इंडिया शाइनिंग की शोशेबाजी एक बार फेल हो चुकी है।

क्या काठ की हांडी बार-बार चढ़ेगी?  

शुक्रवार, 19 मई 2017

चलो, अपने लिए लिखा जाए


कई महीनों से अपने लिए लिखना लगभग बंद है। फेसबुक पर एक महीने की छुट्टी लेने से पहले कुछ पंक्तियों में अपनी बात कहता रहा, लेकिन बहुत मुकम्मल तौर पर नहीं। एक महीने की छुट्टी के बाद आज ही फेसबुक पर वापसी की है। पिछले एक महीने में कुछ लिखा तो वो थीं-खबरें। न्यूज़ बुलेटिन की खबरें, प्रोमो, पैकेज, एंकर विजुअल। 
मन को पता नहीं क्या हो गया है? सिर्फ खबरों में ही जीता है। घर जैसे छूट रहा हो! जीवन में जैसे रस ही नहीं बचा। जितनी भी है, लेकिन रचनात्मकता भी खबरों से बाहर नहीं निकल पाती।
आज शाम सूर्यास्त देख रहा था। लगा एक दिन हम भी डूब जाएंगे। हमारे डूबने के बाद उगने की बात नहीं हो सकती। सोचा, आज निराशा को डूबाया जाए। आशा को फिर से उगाया जाए। जितना हो सके रचनात्मकता की ओर बढ़ा जाए। चाहे 4 लाइन हो या 40। कुछ लिखा जाए। अपने लिए। आप भी पढ़ सकते हैं। चाहें तो पढ़ें, या ना पढ़ें। आपकी मर्जी।
अब मिलते रहेंगे।

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

पापा का सवाल तो बड़ा है !



यूं तो हर दूसरे-तीसरे दिन पापा से बात होती रहती है, लेकिन आज हुई बात कुछ खास थी। सूर्योदय के साथ ही अखबार पढ़ने वाले पापा ने आज संयोग से ऑल इंडिया रेडियो पर समाचार सुना था। कच्चे तेल के दाम 28 डॉलर प्रति बैरल हो जाने पर अचरज जताने के लिए फोन किया था। प्रतिबंध हटने पर ईरान में तेल का उत्पादन बढ़ने के बाद तेल के दाम और कम होने की संभावना पर भी वे ताज्जुब में थे। पापा इस बात को लेकर परेशान थे कि दो साल पहले जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम 140 डॉलर प्रति बैरल था और तब अपने यहां पेट्रोल 72 रुपए लीटर के करीब बिक रहा था और डीजल 55 रुपए के करीब था। आज जब कच्चा तेल 28 डॉलर पर है और इसके और भी कम होने की बात की जा रही है तब भी अपने यहां पेट्रोल का दाम 60 रुपए के आस-पास और डीजल करीब 47 रुपए ही है। उनका सरोकार इस बात से था कि आखिर, अपने यहां दाम कम क्यों नहीं हो रहे ? पापा ने तर्क भी दिया, कि जब वहां दाम बढ़ते हैं तो सरकारें तुरत-फुरत में दाम बढ़ा देती है लेकिन जब दाम गिरते हैं तो यहां के लोग कुंभकर्णी नींद में सो जाते हैं। दिक्कत तो है। आखिर महंगाई बढ़ रही है। गांव में सुविधाएं हैं नहीं, ऐसे कैसे होगा स्टार्टअप इंडिया ? पापा का ये सवाल आपसे भी है...

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2013

सरकार पर भारी...



लो जी, राहुल जी का मुंह खोलना था कि पूरी सरकार साष्टांग दंडवत करने के लिए जमीन पर लोट गई। उन्होंने दागी नेताओं की नैया पार लगाने वाले अध्यादेश को ‘बकवास’ क्या बताया, उन सभी नेताओं के सीने पर सांप लोट गया जो इसकी तारीफ करते नहीं अघाते थे। कुलांचे भरते थे। दूसरों को कोई कुछ समझ ही नहीं रहा था। वो तो भला हो भारतीय जनता पार्टी का, जिसने अध्यादेश पर सहमति जताने के बाद उतनी ही तेजी से कन्नी मारी जैसे अचानक तेज हवा चलने से पतंग मारती है। कन्नी मारी। सीधा राष्ट्रपति भवन। पार्टी अध्यक्ष से लेकर पुछल्ले तक, सभी जोश में थे। दादा से मिले। लौटे। बयानबाजी की। गेंद उनके पाले में। कांग्रेस किंकर्तव्यविमूढ़। गेंद को जाती देख रही थी। लेकिन वो कांग्रेस ही क्या जो राजनीति को अपने हिसाब से न चलाए। बन गई रणनीति। सज गई दुकान। राहुल जी ने मोर्चा संभाला। सीधे प्रेस क्लब। पूरे देश का मीडिया जुटता है यहां। कोई दिक्कत नहीं। राहुल के नाम पर कुछ और आ गये। रुके नहीं राहुल। आये। बोले। चले गये। बवाल पीछे छोड़ गये। ‘बकवास अध्यादेश। फाड़ देना चाहिए।’ देश में ‘बकवास’ अध्यादेश पर बवाल हो गया। अखबारों में पहले पन्ने पर खबर छापने की तैयारी हो रही थी। हर समाचार चैनल पर बहसबाजी हो रही थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमेरिका में राष्ट्रपति ओबामा से मिल रहे थे। ‘बकवास’ अध्यादेश पर बवाल सुना तो आवाज हलक में ही रह गई। वैसे भी, वे यहां तो बोलते नहीं हैं, लेकिन पहली बार हुआ कि बाहर भी बोलने में मुश्किल हो रही थी। लेकिन यहां कांग्रेसी नेता बेखौफ बोल रहे थे। राहुल की हां में हां मिला रहे थे। ना मिलाते तो करते क्या ? कांग्रेस पार्टी और सरकार में पद पाना और बात है। पद को बचाए रखना और बात। चापलूसी भी कोई चीज होती है ना! अगर वो नहीं आती तो राजनीति (!) कैसे करते ? रातोंरात राहुल हीरो हो गये। जनता का दिल जीत लिया। प्रधानमंत्री ने भी राहुल की बात को जनता की बात मान कर माथे से लगाया। याद आई लोकपाल के लिए अन्ना की लड़ाई की। तब तो लोग भी थे। नहीं सुनना था, नहीं सुनी गई। लेकिन राहुल के पीछे कौन लोग थे भाई ? जनता को कौन समझाए ? ये राजनीति की रणनीति है भैया। जो दिखता है, वो होता नहीं है और जो हो जाता है, उसका पता भी नहीं चलता। फिर राहुल को नेता भी तो बनाना है। अब तक तो सभी उन्हें बच्चा ही मानते थे। लेकिन उन्होंने बता दिया है कि गंभीरता से लेना सीख लो। कलावती को भूल गये तो क्या हुआ ? नियामगिरी की लड़ाई दिल्ली में नहीं लड़ सके तो क्या हुआ ? कुछ वादे करने के लिए भी किये जाते हैं। अब वे भी राजनीति सीख गये हैं। जी। अब राहुल सरकार से बड़े हो गये हैं। पार्टी ने उपाध्यक्ष बना कर पहले ही संकेत दे दिया था। लेकिन वे सरकार से बड़े हो जाएंगे, ये किसी ने नहीं सोचा था। विपक्ष के पाले से गेंद छीनकर अपनी ही सरकार को हिट विकेट कर दिया। सरकार बैकफुट पर। मुगालते में मत रहियेगा। अब बारी विपक्षी दलों की है। जिनने खुद भी कई दागी पाल रखे हैं। नंबर उनका भी आना है। बीजेपी के कई सांसद हैं, जिनके केस बीसियों साल से चल रहे हैं। समाजवाद का मुखौटा लगाए मुलायम सीधे तौर पर भले ही बच गये, लेकिन उनके भी कई चेले-चपाटी खतरे में हैं। सरकार की लंगड़ी कुर्सी को भले मायावती ने भी थाम रखा है, लेकिन नंबर उनके सांसदों का भी आना है। लालू यादव और राशिद मसूद साहब का हश्र आप देख चुके हैं। आजम खान हैं कि नेताओं को हो रही सजा पर भी दुख जता रहे हैं। दरअसल, ये हताशा है। निराशा है। आज कांग्रेस और उसकी गोद में बैठे लालू गये हैं। कल को औरों की भी बारी आ सकती है। लिस्ट कितनी भी लंबी हो सकती है। टू जी के तार चुराने का मामला हो, कॉमनवेल्थ गेम्स में हुए भ्रष्टाचार का या कोयला खदानों से निकली कालिख का, जो अभी तक सही चेहरे पर नहीं लग पाई है। सरकार से उपर पहुंच चुके राहुल गांधी ने रास्ता तैयार करवा दिया है। बलि के बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी ?



Rajan Kumar Agrawal
B-14, Surya Apartment
Kh no. 476, Near Shalimar palace
Swaroop Nagar road
Burari
Delhi 110084

Mob 9811343224
9911343224

बुधवार, 26 जून 2013

घीसू कैसे जाएगा उत्तराखंड?

प्रेमचंद के घीसू और माधव रात सपने में आये थे। कह रहे थे-बबुआ हमलोगन को भी उत्तराखंड दौरे पर जाना है.. कोई रास्ता बताओ। मैंने कहा- घीसू काका, तुम्हारा तो पता नहीं लेकिन माधव तो हो भी आया। घीसू काका चौंके। चौड़ी हो रही आंखों में सवाल था। मानों पूछ रही हों-कब?

मैंने जवाब दिया- माधव ने ही तो गांधी परिवार में जन्म लिया है काका। अब तो उसी का राज है। घीसू काका ईर्ष्या से जल भून रहे थे। वो भी जाना चाहते थे उत्तराखंड। बेटा हो आया था। कंपीटिशन था। ठीक वैसा ही जैसा दोनों बाप-बेटों के बीच गरमा गरम आलू भकोस लेने का था (गर्भवती बहू अंदर प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी, लेकिन उसकी चिंता दोनों को नहीं थी)

पुनश्च: घीसू माधव चाहे जिसे समझिए, लेकिन प्रसव पीड़ा से तड़प रही गर्भवती बहू तो वहां फंसी जनता ही है...

मंगलवार, 25 जून 2013

'आफत के बीच मेले सा रोमांच!'

बौरा गया मीडिया... राहुल जी गुप्तकाशी में हैं... सुना फंस गये हैं... अब वे खबरों में हैं... पीड़ित पीछे छूट गये भैया... सब तरफ राहुल ही राहुल...
हे भगवान, कोई कुछ देता क्यों नहीं... कोई इनको समझाता क्यों नहीं.. गये क्यों थे... लाव लश्कर के साथ... तामझाम से लैस होकर... कोई मेला थोड़े ना लगा था कि बच्चे ने जिद कर ली... 'हमें तो मेला देखने जाना है और मां ने हिदायत देकर भेज दिया। बेटा, ध्यान से जाना। पानी बरस रहा है, पैर ना फिसल जाए!'

अरे! किसी ने मां को ही बता दिया होता- 'बहन जी, मेला नहीं लगा। आफत आई है... घूमने के लिए विदेश में जगह कम है क्या जो उत्तराखंड भेज रही हैं...' लगता है कांग्रेस के रागदरबारियों में ये सलाह देने की भी हिम्मत नहीं बची। और रही सही कसर मीडिया ने पूरी कर दी। राहुल बाबा फंस गये ... गुप्तकाशी में फंसे राहुल बाबा - ब्रेकिंग न्यूज हो गई है। टीवी को क्या चाहिए... एक अदद चेहरा.. और राहुल से खूबसूरत और कुंवारा चेहरा कौन है? चेहरा चमका रहे हैं टीवी वाले... पीड़ितों की खबर ब्रेक के बाद...

(विषयांतर) सलमान खान ही हैं.. वो भी चर्चा में ही हैं

शुक्रवार, 7 जून 2013

टिप, टिप, टिप...


टिप... हेलमेट पर पहली बूंद पड़ते ही कानों में जोर की आवाज आई... टनाक। टिप, टिप, टिप... टनाक, टनाक, टनाक। हेलमेट बज रहा था। कान झेल रहे थे मोटी मोटी बूंदे। जब वे ऑफिस से निकले थे, तब तक बादलों ने पूरी दिल्ली पर कब्जा कर लिया था। तेज हवाएं चल रही थीं, सड़कों पर धूल भरी थी, हेलमेट से कुछ दिख नहीं रहा था, शीशा उठाया तो आंखों पर सीधे धूल ने हमला कर दिया। उन्हें कहीं इंटरव्यू में जाना था, लेकिन ऐन मौके पर टाइम नहीं मिला तो घर निकल लिये। कुछ ही दूर चले होंगे कि बारिश। दिल्ली की तेज गर्मी के बाद की बारिश! तेज हवाओं की वजह से तापमान तो गिरा था लेकिन मौसम में गर्मी थी। और ऐसी वैसी नहीं, जोरदार। इतनी कि बादलों को भी पसीना आ गया। पहले तो कम रहा, लेकिन दिल्ली की गर्मी तो दिल्ली की ही है। देखते देखते पसीना चूने लगा। लगातार। अंधाधूंध। कुछ लोग इसे बारिश भी कहते हैं। काली सड़कें साफ होती दिखाईं दीं, लेकिन तेज हवाओं ने हरी भरी दिल्ली का कुछ हिस्सा काली सड़कों पर ला पटका और सड़कें हरी हरी काली सी हो गईं। बाइक वालों ने फ्लाई ओवरों और बस स्टाफ के नीचे जगह बना ली थी... सड़क पर सिर्फ कारें दिखाई दे रही थीं... छोटी कार, बड़ी कार, ऊंची कार, नीची कार, मोटी कार, चपटी कार... तरह तरह की कारें। उन कारों के बीच वे अकेले बाइक पर चले जा रहे थे। इस एहसास में कि चारों तरफ उनका काफिला चल रहा है और काफिले के बीच शहंशाह बाइक पर सवारी कर रहे हों। कंधे भीग चुके थे। बाजुएं तरबतर हो रही थीं, अचानक उन्हें अपने मोबाइल फोन का ख्याल आया और झट से बाइक किनारे करके उन्होंने उसे और अपने पर्स को पॉलिथीन के हवाले किया। शर्ट की बटन खोली और थैली शर्ट के अंदर। अब उनके चेहरे पर इत्मीनान था। बाइक फिर दौड़ रही थी। 60-70-80 की रफ्तार। दिल में डर भी कि बाइक फिसल ना जाये! कई दिनों से बाइक पर ही चिलचिलाती गर्मी में फ्राई होने के बाद उनके पास मौका था बारिश (बादलों के पसीने) में भीगने का।


पारा कभी 45 तो कभी 47। धरती सूखी हुई थी और सूखी हुई धरती को फिर से हरा भरा बनाने के लिए बादल मेहनत कर रहे थे तो पसीना तो आना ही था। पसीने का असर मौसम पर था। खुशगवार। उनके शरीर पर भी था। पहले शर्ट भीगी। फिर बनियान और फिर आत्मा तृप्त होती सी महसूस हुई। बरसों बाद। अकेले। बाइक पर भीगते हुए घर जाने का एहसास ऑफिस की मायूसी और खटपट पर भारी पड़ रहा था... लेकिन कुछ था जो पीछा नहीं छोड़ रहा था। पिछली कुछ बातें, कुछ यादें, कुछ सुनहरे पल उनके दिमाग में आ-जा रही थीं। बहरहाल। प्रगति मैदान से होते हुए वे रिंग रोड पर पहुंच चुके थे। उन्होंने एक बार फिर हेलमेट का शीशा उठाया लेकिन तेज हवाओं ने उन्हें बता दिया कि सही सलामत घर पहुंचना है तो शीशा बंद रखने में ही समझदारी है। राजघाट पर तीन मिनट की लाल बत्ती इंतजार कर रही थी। धीमी होती हुई बाइक जेब्रा क्रॉसिंग पर पहुंच कर रूक गई। इंजन बंद। नजरें आसमान पर। उन्होंने हेलमेट उतारा और चेहरे पर बूंदों को महसूस किया। इतने में उन्हें महसूस हुआ कि जूते पानी से लबालब भर गये हैं। मन ही मन सोचा जैसे पैरों में घड़ा बांध कर चल रहे हों। एक बार जूता उतारने का ख्याल मन में आया लेकिन अगले ही पल झटक दिया। प्रकृति के साथ चलने की छोटी सी कोशिश। पूरा शरीर तरबतर हो चुका था। गीलेपन का ये अनोखा सुखद अहसास था, बरसों बाद। कैसे छोड़ा जा सकता था। वे प्रकृति के साथ भरपूर रोमांस कर रहे थे। दिमाग में जो चल रहा था, उसे बिना हटाए वे बारिश का मजा ले रहे थे। उन्हें कुछ याद आ रहा था, लाँग ड्राइव, भाटी माइंस, सर्पीली चौड़ी सड़कें, दोहरे इंद्रधनुष... वो गलियां... इतने में पीछे से हॉर्न का शोर सुनकर यादों से ध्यान हटा तो देखा कि बत्ती हरी हो चुकी है और उनके पीछे खड़े लोग उन्हें खा जाने वाली नजरों से देख रहे हैं।


बाइक आगे बढ़ी। तेज। यादों का स्पीडोमीटर बाइक के स्पीडोमीटर से रेस करता हुआ। 50-60-70-80... आगे तेज मोड़ था। यादों पर ब्रेक के साथ ही बाइक की रफ्तार भी धीमी हुई, फिसलने का डर जो सता रहा था। इतने में हनुमान मंदिर आ गया। सामने ही निगम बोध श्मशान घाट भी है... एक अनजाना सा डर भी उनके मन में था। लेकिन इन दिनों डर के आगे ही जीत है। वे चले जा रहे थे। बस अड्डे के बाद जैसे बाइक ने सड़क को पहचान लिया हो। रफ्तार की सूई 80 से नीचे आ ही नहीं रही थी। वे कारों से रेस कर रहे थे। हेलमेट के शीशे पर जमा बूंदे रास्ता देखने में बाधक हो रही थीं, लेकिन वे रेस कर रहे थे। वजीराबाद फ्लाई ओवर से ठीक पहले उनके आगे-आगे एक काली कार चली जा रही थी। सड़क पर जमा पानी को चीरती हुई। वे उस पानी में खुद को भिगाना चाहते थे, अचानक लगा जैसे कार की रफ्तार कम हुई और वो बाईं तरफ मुड़ रही है, वे सहम गये थे। रफ्तार रेस वाली थी और संभलने का कोई मौका नहीं था... उन्होंने और रेस दी। जब तक कार उनके पास आती वे कार से आगे थे, लेकिन अब तक उनकी बाइक सड़क पर जमा दो फीट पानी में घुस चुकी थी। रफ्तार कम हो गई थी... अगर बाइक बंद हो जाती तो घर तक धक्का लगाना पड़ता। उन्होंने खट से गीयर बदला और एक नंबर लगा कर पूरा एक्सीलेटर घुमा दिया। घर्र-घर्र करती बाइक पानी से बाहर आ गई थी और उनकी सांस सदमे से। फ्लाई ओवर से उतरते-उतरते बारिश धीमी हो चुकी थी। हवा की ठंडक ने शायद बादलों का पसीना सुखा दिया था। वे चले जा रहे थे। घर अब भी 8 किलोमीटर दूर था। गीले हो चुके कपड़े सूख रहे थे। उनकी आत्मा तृप्त हो चुकी थी। पुरानी पड़ चुकी बाइक पर बारिश में करीब पैंतीस किलोमीटर का सफर रोमांस और रोमांच से भरपूर था। मौज भी थी और खतरा भी। लेकिन अब वे खतरों को जीना चाहते थे.. वे जीना सीख रहे थे...

रविवार, 19 मई 2013

चरित्र को समझिए ना...


तीन क्रिकेटरों पर स्पॉट फिक्सिंग के आरोप हैं. अब जोरों का शोर है कि आईपीएल पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए... वे ज्यादा जोर से कह रहे हैं जो संसद में बैठते हैं लेकिन सीधे आईपीएल से उनका कोई सरोकार नहीं है, लेकिन उन्हीं के भाई बंधू बचाव कर रहे हैं जो किसी न किसी (सीधे या परोक्ष) रूप में इससे जुड़े हैं... अगर 162 आपराधिक प्रवृति वालों से संसद पर दाग नहीं लगता तो सिर्फ तीन पर आरोप लगने से क्रिकेट पर दाग कैसे लग जाता है भैया...
और बताइए कि जब नेताओं की रैलियों में लड़कियों के नाचने से संस्कृति खराब नहीं होती तो आईपीएल में चीयरलीडर्स के नाचने से संस्कृति पर डाका कैसे पड़ जाता है...
जब बड़े बड़े नेता जी (अक्सर रिटायरमेंट के करीब वाले) के अश्लील वीडियो आने से किसी के कानों पर जूं नहीं रेंगती तो युवा क्रिकेटर अगर किसी के साथ कुछ पल गुजारता है आपत्ति क्यों होने लगती है भाई...

चरित्र को समझिए ना...
एक वीके सिंह थे.. उनकी उम्र को लेकर कितना बवेला मचा था... लेकिन अपने प्रधानमंत्री की उम्र को लेकर कहीं कोई चर्चा नहीं... पिछली बार राज्यसभा का पर्चा दाखिल करते समय वे 74 साल के थे और 6 साल बाद इस बार नॉमिनेशन के वक्त उनकी उम्र 82 साल है। आखिर नेताओं के रिटायरमेंट की उम्र की सीमा जो नहीं होती... 6 साल के दौरान उम्र 8 साल बढ़ जाये तो किसी को क्यों आपति होनी चाहिए भला... विवाद तो सेना प्रमुख के पद को लेकर था... देश के प्रमुख की उम्र में 2 साल की हेराफेरी तो चलती है यार...

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

महाकुंभ का एक फोटो फीचर

महाकुंभ से आने के बाद पहला फोटो फीचर पेश कर रहा हूं. ऐसे कई हैं. फिलहाल एक ये देखिए.  

महाकुंभ में गीजर, हीटर और इमरसन रॉड के इस्तेमाल पर पाबंदी है. आग लगने का खतरा है. बात तो ठीक है और विद्युत विभाग, उत्तर प्रदेश का ये बोर्ड भी इसकी जानकारी देता है, 



लेकिन मेले में नीचे रेत और ऊपर आसमान. ठंढ ने परेशान कर रखा है. ऐसे में नहाने के लिए गीजर का खुलेआम प्रयोग हो रहा है.



मेले में विद्युत विभाग के कई दफ्तर हैं. वहां शिकायत कक्ष भी हैं, 





लेकिन सरकारी कर्मचारियों का हाल किससे छुपा है? जी हां, यहां भी भाई साहब नदारद हैं....

अब आप भी क्या कीजिएगा. इसी मेले से तो तय होगा कि बीजेपी की ओर से देश के प्रधानमंत्री पद का अगला उम्मीदवार कौन होगा ???

बुधवार, 23 जनवरी 2013

सिस्टम का क्या करोगे ?



सिस्टम बहुत जरूरी है. कोई भी जगह हो, अगर सिस्टम नहीं होगा तो व्यवस्था ढह जाएगी. आप किसी भी मशीन को ले लीजिए. छोटी हो या बड़ी. अगर एक नट भी इधर से उधर हुआ नहीं कि मशीन चलने में दिक्कत आने लगेगी. जोर से आवाज होगी, मशीन कांपेगी और फिर काम करना बंद कर देगी. कुछ ऐसा ही हमारे समाज के साथ भी है. संपूर्णता में देंखे तो ये भी मशीन की तरह ही काम करता है. लेकिन हमारा समाज ऐसी मशीन में तब्दील हो चुका है जो चलती कम है, बंद ज्यादा रहती है. दरअसल, इसके सिस्टम में जंग लग चुका है. जो इसे धीरे-धीरे और खोखला बनाता जा रहा है. बानगी देखिए. मेरे पड़ोसी हैं जियो चेरियन. मूलतः केरल के रहने वाले हैं. पिछले दिनों उनका पर्स खो गया. वे शिकायत दर्ज करवाने बुराड़ी (दिल्ली) थाने पहुंचे. लेकिन थाने में मौजूद 8-10 पुलिसकर्मी बातचीत में मशरूफ थे. उनसे कहा गया कि शिकायत दर्ज करने वाला कर्मी अभी आने वाला है. 2 घंटे बीत गये. जियो शिकायत दर्ज करवाने के लिए डटे रहे. लेकिन किसी पुलिसकर्मी ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया. उनका 6 साल का बेटा गाड़ी में पापा का इंतजार करता रहा. जब वो रोने लगा तो पिता जियो उसे लेकर घर लौट आये. ये महज एक वाकया है कि मशीन में खराबी कहां से शुरू होती है. सोचिए, जब दिल्ली पुलिस पर्स गुम होने की शिकायत दर्ज करने में इतनी आनाकानी करती है तो बड़ी वारदातों पर (जो मीडिया में नहीं आते) पर उसकी कैसी प्रतिक्रिया होती होगी?


सिर्फ पुलिस विभाग का ही सिस्टम बिगड़ा हो, ऐसा भी नहीं है. नेता जी भी हाथ धो रहे हैं. सर्दी में हुई बारिश के निशान आपको आज भी बाहरी दिल्ली के बुराड़ी इलाके में मिल जाएंगे. यहां के विधायक जी के आवास के बाहर के जोहड़ में पानी जमा हो गया. गांव का पानी लगातार आ ही रहा था. बदबू उठने लगी तो विधायक जी ने पंप सेट लगवा दिया. जोहड़ खाली करवाया जा रहा है और ये बदबूदार पानी बुराड़ी से स्वरूप नगर जाने वाली सड़क पर निकाला जा रहा है. विधायक जी के घर के बाहर जो बदबू उठती थी उसने अब पूरी सड़क पर कब्जा कर लिया है. उस रास्ते से गुजरने वाले हलकान हो रहे हैं. शिकायतों की सुनवाई कहीं नहीं हो रही है, आखिर विधायक जी का मामला है. ये भी एक सिस्टम है जो स्वार्थी हो चुका है.


दिल्ली से निकलिये. बिहार चलते हैं. सुपौल. जहां 2008 में जबरदस्त बाढ़ आयी थी. शिक्षा विभाग ने हैंडीकैप्ड बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षकों के खाली पदों को भरने के लिए रिक्तियां निकाली थीं. पद से कम ही लोंगों ने आवेदन किया था. लेकिन इन लोगों को भी उस दिन बुलावा मिला जिस दिन भर्ती की आखिरी तारिख थी. आखिर ऐसा क्यों है \ सिस्टम ऐसा क्यों हो गया है\ मशीन में जंग लग जाए तो खराब हो जाती है... सिस्टम का क्या करोगे जिसमें भ्रष्टाचार की दीमक लग चुकी है? 

बुधवार, 9 जनवरी 2013

खतरे में हरियाणा सरकार?



क्या बच पाएगी हरियाणा की कांग्रेस सरकार?  2009 में कांग्रेस की दोबारा सरकार बनवाने के लिए समर्थन देने वाले हजकां के 5 विधायकों के मामले में 13 जनवरी से पहले विधानसभा अध्यक्ष को फैसला सुनाना है. तब हजकां ने 6 सीटें जीती थी, जिनमें से 5 सरकार में शामिल हो गये. इन सभी को मंत्री या सीपीएस बना दिया गया. लेकिन अब जान सांसत में फंसी है. इनमें से 3 एक बार कांग्रेस की गोद में बैठे और 2 अलग-अलग. यानी पार्टी टूटने की बात भी सिरे नहीं चढ़ती. सारा दारोमदार विधानसभाध्यक्ष कुलदीप शर्मा पर है. उनके फैसले पर पूरे प्रदेश की निगाहें लगी हुई है. 13 जनवरी की तारीख ऐतिहासिक होने जा रही है. अगर कुलदीप शर्मा हजकां से टूट कर आये पांचों विधायकों के समर्थन को असंवैधानिक ठहराते हैं तब भी और उनके हक में फैसला सुनाते हैं तब भी. समर्थन को असंवैधानिक ठहराने पर प्रदेश की कांग्रेस सरकार पर असंवैधानिक सरकार चलाने का आरोप अपने आप लग जाएगा और समर्थन को सही बताने पर दल-बदल कानून की धज्जियां उड़ना तय है.

अगर फैसला इन विधायकों के खिलाफ होता है तो सरकार के जाने का खतरा भी है. अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि इतने समय तक कांडा के जेल में रहने के पीछे भी मुख्यमंत्री हुड्डा का ही हाथ है. सूत्र बताते हैं कि प्रदेश के निर्दलीय विधायक हुड्डा सरकार से खुश नहीं हैं. गोपाल कांडा जेल में हैं, लेकिन उनके जन्मदिन पर सिरसा में जुटे 3 निर्दलीय विधायकों ने अपनी उपस्थिति से संकेत दे दिया है कि वे गोपाल कांडा के साथ हैं. ऐसे में हुड्डा चाहते हैं कि कांडा अपने समर्थक विधायकों सहित सरकार को समर्थन की चिट्ठी सौंप दें. अगर ऐसा नहीं होता और कांग्रेस को समर्थन देने वाले हजकां के पांचों विधायकों का समर्थन असंवैधानिक ठहरा दिया जाता है तो सिर्फ 40 सीटें जीतने वाली कांग्रेस के पास 3 और निर्दलीय विधायकों का ही समर्थन रह जाएगा. जबकि 90 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बचाने के लिए 46 सदस्यों का समर्थन जरूरी है.

ऐसे में इंतजार कीजिए विधानसभाध्यक्ष कुलदीप शर्मा के फैसले का. अब ज्यादा दिन नहीं बचे हैं. आखिर बलि के बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी?

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

नवोदय और सरकारी स्कूल

गांधी जयंती पर, जब पूरा देश छुट्टी मना रहा था, दिल्ली के झंडेवालान का एक सेमिनार हॉल गुलजार था। देश के तमाम नवोदय विद्यालयों से निकले छात्र इकट्ठा हुए थे। पहले बैच से लेकर इस साल पास आउट करने वाले भी। ज्यादातर सेटल्ड। कोई नौकरी कर रहा था, तो कोई व्यापार। मेडिकल, इंजीनियरिंग, वकालत, एकाउंटेंसी, पत्रकारिता हर क्षेत्र में नवोदय के छात्रों की पहुंच है, पकड़ है। तमाम पेशे से जुड़े नवोदय के इन पुराने  छात्रों के एकजुट होने का एक मकसद था। नवोदय में पढ़ रहे या इस साल 12वीं पास आउट करने वाले छात्रों की कॅरियर काउंसलिंग। नेक विचार है। अगर ईमानदार भी हो ? जिस संस्था से आप बरसों जुड़े रहे हों, वहां तमाम सुविधाओं का फायदा उठाकर अपना कॅरियर बनाया हो, वहां के छात्रों के उज्ज्वल भविष्य के बारे में सोचना, सोच कर ही अच्छा लगता है। 

नवोदय विद्यालयों में पढ़ाई के साथ-साथ रहने, खाने से लेकर खेल-कूद तक हर तरह की सुविधा दी जाती है। ऐसे में जब इस मीटिंग के अगले ही दिन तीन अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकारों को सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं मुहैया करवाने का आदेश दिया तो अनायास ही अपने नवोदय विद्यालय की याद ताजा हो गई। जहां हर तरह की सुविधा मिलती थी। 

एक तरफ तो सरकारी स्कूलों में पीने का पानी, शौचालय, किचन शेड, बिजली, और चारदीवारी तक की व्यवस्था नहीं है। शिक्षकों की कमी है। जो हैं, उनके पास पढ़ाने के अलावा और कई दूसरे काम हैं। ये दो तस्वीरें हैं सरकारी शिक्षा व्यवस्था की। एक तरफ सरकारी स्कूलों में जहां पीने के पानी की व्यवस्था तक नहीं है, वहीं दूसरी ओर नवोदय विद्यालय में नहाने और कपड़े धोने का साबून, तेल, टूथेपस्ट, ब्रश, कपड़े, तमाम चीजें मुफ्त मिलती थीं। यहां विद्यालय परिसर में ही शिक्षक भी रहते थे, जो 24 घंटे मदद के लिए तैयार रहते थे। मुझे जवाहर नवोदय विद्यालय, सुपौल, (बिहार) से निकले हुए 13 साल हो चुके हैं, लेकिन आज भी लगता है कि जैसे कल ही बात हो। काश! सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन हो, और नवोदय जैसी सुविधाएं तमाम सरकारी स्कूलों में भी मिलें तो कितना अच्छा हो ? 

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

100 रुपये में मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई



शनिवार को दिल्ली में दो नेत्रियों ने दहाड़ लगाई। दोनों अपने-अपने राज्य की मुखिया। एक तरपफ ममता थी तो दूसरी तरफ शीला। ममता फूफकार रही थी तो शीला चुप करा रही थी। मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई के विरोध में पश्चिम बंगाल से जंतर-मंतर पहुंची ममता बनर्जी ने जनता को आवाज लगाई और केंद्र सरकार को चेताया भी कि जंतर-मंतर की भीड़ में बंगाल से लाए हुए लोग नहीं हैं। अगर दो रेलगाड़ी भी भर कर ले आती तो क्या हाल होता? क्या ममता सच कह रही हैं? पश्चिम बंगाल से कोई नहीं आया? चलिए मान लेते हैं। 


दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के आवास पर जो मोर्चा निकाला गया, उसमें भी काफी संख्या में लोग दिखाई दिए। शोर-शराबा। धक्कमपेल। हंगामा। शीला को लोगों से चुप रहने की अपील करनी पड़ी। ये मोर्चा मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई के समर्थन में था। 28 अक्टूबर को होने वाली रैली की योजना के लिए था। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इस रैली की अगुवाई करेंगी। बानगी दिखानी थी। भीड़ जुटानी थी। मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई के प्रति लोगों की दीवानगी दिखानी थी। लोगों को लाया गया। भाड़े पर। शनिवार की देर रात जब घर वापसी पर बुराड़ी पहुंचा तो चैराहे पर भीड़ थी। मस्त युवा। नशे में पस्त युवा। 100 रुपये नकद भी मिले थे। किसने दिये? नहीं पता। क्यों दिए? शीला के घर जाने के लिए। और क्या चाहिए? बेरोजगार और निठल्ले लोगों को 100 रुपये और मुफ्त की शराब मिल जाये तो कहने ही क्या? 


शीला की मानें तो मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई लागू करने वाला दिल्ली पहला राज्य हो सकता है। मनीष तिवारी भी कहते नहीं अघाते कि चीन ने 1992 में मल्टीब्रांड रिटेल में 100 पफीसदी एफडीआई दे दी थी। लेकिन हमारे नेताजी ये क्यों नहीं देखते कि चीन में कितनी बेरोजगारी है? एक आम चीनी नागरिक को जीने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ रहा है? नेताओं की मौज तो वहां भी वैसी ही है, जैसी अपने यहां है। प्रधानमंत्री की एक थाली 7,723 रुपये की!


शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

गुदड़ी का लाल-सनत

सुपौल के एक छात्र ने कोसी क्षेत्र का नाम रोशन किया है। सनत आनंद (16) को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में काउंसिल फार साइंस एंड इंडस्ट्रीयल रिसर्च (सीएसआईआर) की तरफ से बुधवार को 70वें स्थापना दिवस समारोह में सम्मानित किया गया। सनत को 2011 का स्कूली बच्चों को नयी वैज्ञानिक खोज के लिए दिए जाने वाले सम्मान से सम्मानित किया गया है।

 प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुए समारोह में केंद्रीय मंत्री व्यालार रवि और सी.एन.आर. राव ने सनत को सर्टिफिकेट, ट्रॉफी, नकद 50 हजार रुपये और बेहद खास अंदाज में हाथ मिलाकर सम्मानित किया।   
                          
इस दौरान समारोह में मौजूद सनत के माता पिता के चेहरे पर गर्व का भाव देखने वाला था। इस दौरान सनत के स्कूल (वेलहैम ब्वॉयज स्कूल,देहरादून) के प्रिंसीपल की आंखे नम हो गई थी।
 
सनत ने एक ऐसी मशीन बनाई है, जो बिना किसी दूसरी मशीन  की सहायता के भी जीपीएस (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) जैसा काम करती है। उन्होंने इसका नाम रखा है स्टैंडअलोन जीपीएस सिस्टम। यानी ऐसा जीपीएस जो बिना किसी मदद के भी किसी की लोकेशन का पता लगा सके। 
गौरतलब है कि जीपीएस के लिए पूरी दुनिया सिर्फ अमेरिका पर ही निर्भर है। अमेरिका के 24 सेटेलाइट 24 घंटे काम करते हैं,जिसकी मदद से आज किसी भी आदमी की लोकेशन का पता पलक झपकते ही चल जाता है। अमेरिका के 24 सेटेलाइट पृथ्वी के चारों ओर मौजूद हैं। लेकिन सनत ने जो मशीन  बनाई जिसे किसी सेटेलाइट की जरूरत नहीं है। यह पूरी तरह से सिर्फ और सिर्फ पृथ्वी की घूर्णन गति और चुंबकीय क्षेत्र पर ही निर्भर है। इस जीपीएस मशीन  को किसी बाहरी मदद की जरूरत नहीं है।16 साल के सनत की ये मशीन भौगोलिक रूप से पिछड़े इलाकों, घने जंगलों और समुद्र में भी पता बता सकती है। इतना ही नहीं, इस नन्हें वैज्ञानिक के स्टैंडअलोन जीपीएस सिस्टम का ना तो पता लगाया जा सकता है और ना ही इसे जाम किया जा सकता है। 

सनत का जन्म सुपौल के प्रतिष्ठित गिरधारी लाल मोहनका परिवार में हुआ। गिरधारी लाल मोहनका के बड़े बेटे और मुंबई में पोस्टेड सीनीयर सीआईएसएफ कमाडेंट शिव कुमार मोहनका सनत के पिता हैं। सनत की शुरुआती पढ़ाई पटना के सेंट डोमिनिक सेवियो हाईस्कूल में हुई। बेगूसराय में पिता की पोस्टिंग के दौरान वे डीएवी स्कूल के भी छात्र रहे। पिता के बार बार तबादलों के बावजूद सनत ने अपनी शिक्षा का स्तर बनाए रखा। और एनसीईआरटी का नेशनल टैलेंट सर्च इक्जामिनेशन स्कॉलरशिप भी पाई। सनत को फिजिक्स के रहस्य और गणित से जूझने में मजा आता है। बेटे की इस उपलब्धि पर परिजन बेहद खुश हैं। शिव कुमार मोहनका को अपने बेटे की इस खोज पर गर्व है। अपने बेटे की उपलब्धि पर वे कहते हैं-‘पढ़ाई-लिखाई सनत को विरासत में मिली है। इसके दादा बीएसएस कॉलेज, सुपौल के प्रिंसीपल रह चुके हैं। चाचा शरद मोहनका सुपौल में ही वकालत करते हैं। ऐसे में सनत तमाम ऊंचाईयों को छूएगा।’
  
                                   

वेलहैम ब्वॉयज स्कूल, देहरादून में 11वीं में पढ़ने वाले सनत की चर्चा अमेरिका तक में हो चुकी है। विज्ञान में उनकी रूचि और क्षमता को देखते हुए अमेरिका के एक बड़े स्कूल वाचासे अकेडमी ने देहरादून में उनका इंटरव्यू किया और उन्हें सीधे11वीं में विज्ञान विषय लेने का ऑफर दिया। लेकिन देश से दूर नहीं जाने की इच्छा की वजह से सनत ने उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया। वो भी तब जबकि अकेडमी उन्हें अच्छी खासी छात्रवृत्ति भी दे रही थी। 
विज्ञान भवन में हुए इस समारोह में  11 युवा वैज्ञानिकों को विज्ञान और तकनीकि में विशेष योगदान के लिए शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार-2012 से सम्मानित किया गया। 

बुधवार, 26 सितंबर 2012

करोड़ों मांओं की चिंता



बात 1986 की है। ठेकेदारी के काम से पप्पा अक्सर बाहर ही रहते। एक दिन जब घर आए तो साथ में कुछ सामान था। लोहे के लाल लाल लंबवत दो बड़े बड़े बहुत भारी गोल डब्बे। और साथ में एगो चिपटा सा दिखने वाला चूल्हा। तीन मुहं वाला। बताए कि अब इसी पर खाना बनेगा। मां को लकड़ी और कोयले में आंख नहीं फोड़ना पड़ेगा। ललका डिब्बा को बोलते हैं सिलेंडर और ई है चूल्हा। एक बार में तीन चीज बन जाएगा। आधा घंटा में खाना तैयार होगा और राजन के मां को आराम मिलेगा। लेकिन ई चूल्हा चलेगा कैसे, 5वीं पास मां को पता ही नहीं चल रहा था। तब पप्पा ने अपने बैग से एक और डब्बा निकाला। डेढ़ मीटर लंबा हरा-हरा पाइप, लाल रंग का रेगुलेटर। और लाल प्लास्टिक से जुड़ा एगो छोटा सा स्टील का पाइप। पीछे बटन था। दबाने पर लुत्ती फेंकता था। सब को जोड़ जाड़ के चूल्हा तैयार किया और खास अंदाज में स्टील के पाइप को पकड़ कर बटन दबा दिया। चूल्हा भक्क से जला।  मां खुश।  अब मेहनत बचेगी। धुंआ में आंख नहीं फोड़ना पड़ेगा। चूल्हा जलते ही पप्पा ने आॅर्डर किया-चाय। मां ने तुरत-फुरत में बनाकर दे दी। मां चाय नहीं पीती। पप्पा के पास बैठकर पूछा- कितने का आया ई तामझाम। उन्होंने बताया- बाइस सौ (2200) में सब कुछा। 500-500 का सिलेंडर और 1200 का चूल्हा। मां की उत्सुकता खत्म नहीं हो रही थी। पूछा-जब इस पीपा का गैस खत्म हो जाएगा, तब ? जवाब मिला-‘सब हो जाएगा।’ फेर इसी में भर कर गैस आएगा। मां के हाथ नया - नया खिलौना लगा था। खूब जमकर खेली। 20 दिन में गैस खत्म। मां परेशान। राहत थी कि दूसरा सिलेंडर भरा था। पप्पा ने लगा दिया. तब सिलेंडर के लिए बुकिंग नहीं करवानी पड़ती थी। सिलेंडर इंडेन का था.  हमारे गांव जियाराम राघोपुर से 40 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय सुपौल से आना था सिलेंडर। लेकिन दिक्कत यही थी कि वहां से सिलेंडर आएगा कैसे ? कोई 10 दिन और बीत गये. सिलेंडर नहीं आया। अभी कुछ ही घरों में रसोई गैस की सुविधा आ पाई थी। पांच परिवारों ने मिलकर एक रिक्शेवाले को सुपौल जाने के लिए राजी किया। उन दिनों 60 या 63 रुपये में एक सिलेंडर मिलता था। रिक्शेवाले ने मांगे 80 रुपये। अपना किराया-भाड़ा जोड़ कर। सबने खुशी खुशी दिये भी। फिर तो नियम बन गया। वो सुबह 5 बजे निकलता और शाम 7 बजे तक सिलेंडर लेकर वापस आ जाता। वापसी में बिना नागा पव्वा लगाना नहीं भूलता। तब कौन जानता था कि राहत की ये गैस एक दिन जेब जलाने लगेगी। जबसे मां को पता चला है कि पुराने दर (399 रु.) पर अब साल में सिर्फ 6 सिलेंडर ही मिलेंगे, बाकी बाजार भाव से (करीब 750 रु.) लेने होंगे, तब से उसकी परेशानी बढ़ गयी है। वो अब हिसाब लगाने में लगी है कि वो कितने सिलेंडर इस्तेमाल करती है, और अब कितने सिलेंडर बाजार भाव से लेने पड़ेंगे। बढ़ते बजट को देखकर उसकी चिंता बढ़ गई है। और ये चिंता सिर्फ मेरी मां की ही नहीं, बल्कि देश की करोड़ों मांओं की है। 

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

सूखे पर बादल की कलाकारी


एक तरफ तो देश के कुछ हिस्सों में बाढ़ की विभीषिका देखने को मिल रही है, वहीं दूसरी तरफ उत्तरी भारत के राज्यों में सूखे-से हालात बन रहे हैं। अनाज उत्पादन में देश के नंबर वन राज्य पंजाब की हालत बद से बदतर होती जा रही है। मानसून ने दगा दे दिया है। बादल घुमड़ते हैं, पर धरती की प्यास बुझाए बिना ही आगे बढ़ जाते हैं। राज्य सरकार परेशान है। राजनीति गर्म। प्रदेश के राजनीतिक इतिहास को धता बताते हुए लगातार दूसरी बार प्रदेश की कमान संभालने वाले प्रकाश सिंह बादल ने सोचा भी नहीं होगा कि इस बार मानसून ही उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती पेश करने वाला है। देर से आए मानसून ने ‘बादल’ के माथे पर बल ला दिये हैं। मानसून में उमड़-घुमड़ रहे बादल बिन बरसे ही चले जा रहे हैं, वहीं प्रकाश सिंह बादल के पसीने सूखने का नाम नहीं ले रहे हैं। मामला प्राकृतिक है। जमीन वाले बादल कर भी क्या सकते हैं ? उन्होंने गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी है।


पंजाब में अब तक 32 फीसदी बारिश ही हुई है, यानी 68 फीसदी कम। जबकि देश में यह आंकड़ा सिर्फ 22 फीसदी का है। परेशानी लाजिमी है। सूखे के आसार बनते देख प्रकाश सिंह बादल ने बहुत ही सेफ गेम खेला है। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि ‘सूखे को प्राकृतिक आपदा घोषित किया जाए। और कृषि पर आधारित राज्यों को आर्थिक पैकेज देने की घोषणा करे। और केंद्रीय पूल में सबसे ज्यादा अनाज भेजने वाले राज्य के तौर पर पंजाब को विशेष आर्थिक पैकेज दिया जाए।’ बादल की इस मांग से हरियाणा को भी खास ऐतराज नहीं होगा। क्योंकि हरियाणा में भी बारिश की स्थिति कमोबेश ऐसी ही है। यहां अब तक 30 फीसदी बारिश ही हुई है। केंद्र में कांग्रेस की सरकार होने की वजह से हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा विनम्र विनती ही कर सकते हैं, ऐसे में सूखे को प्राकृतिक आपदा घोषित करने की मांग से उन्हें भी राहत महसूस हुई होगी।

मानसून की सुस्त चाल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी परेशान कर दिया है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने सभी मंत्रालयों को हर हफ्ते हालात की समीक्षा करने के निर्देश दिये हैं। हकीकत चाहे जो हो, लेकिन पीएमओ का कहना है कि सरकार ने हालात से निपटने के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार कर रखी है। हालांकि इन योजनाओं से कुछ होने-जाने की उम्मीद करना बेमानी है। क्योंकि जब बाढ़ आती है, तब भी केंद्र और राज्य सरकारों की तथाकथित तैयारियां धरी की धरी रह जाती हैं। और जब सूखे के हालात बन रहे हैं, तब भी सरकारें सिर्फ और सिर्फ बयानों और योजनाओं में ही डूबी दिखाई देती हैं। हम यवतमाल (महाराष्ट्र) और असम में बाढ़ का जानलेवा कहर देख चुके हैं। मध्यप्रदेश के कई इलाके बाढ़ की चपेट में हैं। हालांकि अब भी यहां बारिश सामान्य से नीचे ही है लेकिन जल भंडारण और वितरण की जो व्यवस्था है उसकी वजह से जीवन रूपी जल काल बनता जा रहा है। सरकारी तैयारियों की पोल खुल चुकी है। दरअसल, ये कथनी और करनी का फर्क है, जो जनता के लिए अक्सर जी का जंजाल बन जाता है। इस बीच सूखे से निपटने के लिए कम बारिश वाले छह राज्यों (हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक) के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ केंद्रीय कृषि सचिव आशीष बहुगुणा ने 23 जुलाई को बैठक की थी। जहां कम बारिश की वजह से बड़े हिस्से में धान की बुआई नहीं हो पाई है।

अप्रैल में मौसम विभाग ने बताया था कि इस बार भी मानसून सामान्य रहेगा और देश अनाज उत्पादन में रिकॉर्ड बनाएगा, लेकिन लेट-लतीफ मानसून ने उम्मीद पर संकट के बादल गहरा दिये हैं। देश में करीब 65 फीसदी खेती बारिश पर ही निर्भर है। इस बार अनाज उत्पादन 25 करोड़ 74 लाख टन के करीब रहने का अनुमान था। पिछले साल की तुलना में 1.27 करोड़ टन ज्यादा। लेकिन इस उम्मीद पर भी पानी फिरता नजर आ रहा है। अब मौसम विभाग उम्मीद जता रहा है कि अगस्त और सितंबर महीने में अच्छी बारिश होगी। लेकिन तब तक क्या बुआई का समय बचा रहेगा? मानसून की लेटलतीफी कहीं किसानों के लिए खतरे की घंटी तो नहीं है। क्योंकि कम बारिश का असर खेती पर पड़ने  लगा है। धान, दलहन, तिलहन और मोटे अनाज की बुआई लक्ष्य से पीछे चल रही है। नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर ने चेतावनी दी है कि कम बारिश की वजह से हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार और उत्तर प्रदेश में धान की बुआई की संभावना कमजोर हो रही है।

कृषि विशेषज्ञ डॉक्टर अनुराग का कहना है कि ‘मानसून में देरी की वजह से खरीफ की प्रमुख फसलों की बुआई का समय निकल गया है। ऐसे में कुछ जगहों पर भूजल का इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन जेनसेट के इस्तेमाल से लागत बढ़ जाएगी।’ हालांकि वे कहते हैं कि ‘मूंग की दाल की कुछ किस्में 7 अगस्त तक लगाई जा सकती है। लेकिन अगैती या पछैती की पैदावार सामान्य खेती से कम होती है। ऐसे में पछैती की पैदावार कम होगी। किसान की स्थिति और खराब हो जाएगी।’ हालांकि डॉक्टर अनुराग अब सिर्फ पशुओं के चारे की खेती पर ही जोर देते हैं। उनका कहना है कि ‘पशुओं के चारे से दूध का कारोबार करनेवाले किसानों को सीधे तौर पर फायदा होने की गुंजाइश है।’

इस बार मानसून की शुरुआत ही 5 दिन देर से हुई। उसके बाद भी करीब एक हफ्ते तक मानसून तटीय इलाकों में ही रूका रहा। उत्तर-पूर्वी राज्यों, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र के विदर्भ और आंध्र प्रदेश के तेलंगाना और रायलसीमा में अच्छी बारिश हुई है। लेकिन उत्तर भारत तक पहुंचते पहुंचते कमजोर पड़ गया और अब हालात सूखे जैसे बन गये हैं।

मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने पंजाब को केंद्रीय पूल से एक हजार मेगावाट ज्यादा बिजली देने की भी मांग की है। दसूहा विधानसभा इलाके में संगत दर्शन कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि ‘केंद्रीय ऊर्जा मंत्री से मिलकर पंजाब के लिए केंद्रीय पूल में से एक हजार मेगावाट अधिक बिजली देने की मांग की है।’ पंजाब बिजली संकट से गुजर रहा है। शहरों तक में अंधेरा पसरा है, गांवों की तो बात ही छोड़ दीजिए। ऐसे समय में जबकि पूरा देश बिजली की किल्लत से जूझ रहा है। नार्दर्न ग्रिड फेल हो चुका हो। प्रधानमंत्री भी चिंता जता चुके हों। ऊर्जा मंत्री खुद स्थिति पर नजर रखे हुए हैं, पंजाब को अतिरिक्त एक हजार मेगावाट बिजली देना केंद्र सरकार के लिए भी मुमकिन नहीं होगा। लेकिन केंद्रीय विद्युत मंत्री से मिलकर बादल ने अपना पल्ला झाड़ लिया है। अब सूखे की स्थिति को लेकर ना तो किसान उन पर किसी तरह की लापरवाही का आरोप लगा सकते हैं और बिजली की किल्लत को लेकर न उद्योगपति। बहुत ही सेफ गेम है।

दरअसल, हरियाणा, पंजाब सहित उपरी राज्यों में भी बारिश नहीं के बराबर ही हुई है। जिसकी वजह से गोबिंद सागर में पानी उतनी मात्रा में नहीं है, जितना होना चाहिए। इसका असर बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ा है। भाखड़ा-नांगल पॉवर हाउस की क्षमता 1325 मेगावाट की है। यहां से पैदा की जाने वाली बिजली पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और गुजरात तक सप्लाई की जाती है। लेकिन घटते जलस्तर ने भाखड़ा ब्यास प्रबंधन को चिंता में डाल दिया है। भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड लगातार हालात पर नजर बनाए हुए है।

राजनीति से इतर ये मामला चिंतित करने वाला है। हालात वाकई सूखे जैसे बन रहे हैं, लेकिन सरकारें अपने बचाव में लगी हैं। पंजाब सरकार केंद्र के पाले में गेंद डाल कर निश्चिंत दिखाई दे रही है, वहीं केंद्र ने साफ कर दिया है कि हालात से निपटने के लिए विस्तृत कार्ययोजना बनाई जा चुकी है। अगर योजनाएं तैयार हैं, तो अमल कब होगा ? इसका जवाब शायद कार्ययोजना बनाने वालों के पास भी नहीं है।


ये लेख इतवार पत्रिका में छप चुका है.