शुक्रवार, 19 मई 2017

चलो, अपने लिए लिखा जाए


कई महीनों से अपने लिए लिखना लगभग बंद है। फेसबुक पर एक महीने की छुट्टी लेने से पहले कुछ पंक्तियों में अपनी बात कहता रहा, लेकिन बहुत मुकम्मल तौर पर नहीं। एक महीने की छुट्टी के बाद आज ही फेसबुक पर वापसी की है। पिछले एक महीने में कुछ लिखा तो वो थीं-खबरें। न्यूज़ बुलेटिन की खबरें, प्रोमो, पैकेज, एंकर विजुअल। 
मन को पता नहीं क्या हो गया है? सिर्फ खबरों में ही जीता है। घर जैसे छूट रहा हो! जीवन में जैसे रस ही नहीं बचा। जितनी भी है, लेकिन रचनात्मकता भी खबरों से बाहर नहीं निकल पाती।
आज शाम सूर्यास्त देख रहा था। लगा एक दिन हम भी डूब जाएंगे। हमारे डूबने के बाद उगने की बात नहीं हो सकती। सोचा, आज निराशा को डूबाया जाए। आशा को फिर से उगाया जाए। जितना हो सके रचनात्मकता की ओर बढ़ा जाए। चाहे 4 लाइन हो या 40। कुछ लिखा जाए। अपने लिए। आप भी पढ़ सकते हैं। चाहें तो पढ़ें, या ना पढ़ें। आपकी मर्जी।
अब मिलते रहेंगे।

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

पापा का सवाल तो बड़ा है !



यूं तो हर दूसरे-तीसरे दिन पापा से बात होती रहती है, लेकिन आज हुई बात कुछ खास थी। सूर्योदय के साथ ही अखबार पढ़ने वाले पापा ने आज संयोग से ऑल इंडिया रेडियो पर समाचार सुना था। कच्चे तेल के दाम 28 डॉलर प्रति बैरल हो जाने पर अचरज जताने के लिए फोन किया था। प्रतिबंध हटने पर ईरान में तेल का उत्पादन बढ़ने के बाद तेल के दाम और कम होने की संभावना पर भी वे ताज्जुब में थे। पापा इस बात को लेकर परेशान थे कि दो साल पहले जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम 140 डॉलर प्रति बैरल था और तब अपने यहां पेट्रोल 72 रुपए लीटर के करीब बिक रहा था और डीजल 55 रुपए के करीब था। आज जब कच्चा तेल 28 डॉलर पर है और इसके और भी कम होने की बात की जा रही है तब भी अपने यहां पेट्रोल का दाम 60 रुपए के आस-पास और डीजल करीब 47 रुपए ही है। उनका सरोकार इस बात से था कि आखिर, अपने यहां दाम कम क्यों नहीं हो रहे ? पापा ने तर्क भी दिया, कि जब वहां दाम बढ़ते हैं तो सरकारें तुरत-फुरत में दाम बढ़ा देती है लेकिन जब दाम गिरते हैं तो यहां के लोग कुंभकर्णी नींद में सो जाते हैं। दिक्कत तो है। आखिर महंगाई बढ़ रही है। गांव में सुविधाएं हैं नहीं, ऐसे कैसे होगा स्टार्टअप इंडिया ? पापा का ये सवाल आपसे भी है...

शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2013

सरकार पर भारी...



लो जी, राहुल जी का मुंह खोलना था कि पूरी सरकार साष्टांग दंडवत करने के लिए जमीन पर लोट गई। उन्होंने दागी नेताओं की नैया पार लगाने वाले अध्यादेश को बकवास क्या बताया, उन सभी नेताओं के सीने पर सांप लोट गया जो इसकी तारीफ करते नहीं अघाते थे। कुलांचे भरते थे। दूसरों को कोई कुछ समझ ही नहीं रहा था। वो तो भला हो भारतीय जनता पार्टी का, जिसने अध्यादेश पर सहमति जताने के बाद उतनी ही तेजी से कन्नी मारी जैसे अचानक तेज हवा चलने से पतंग मारती है। कन्नी मारी। सीधा राष्ट्रपति भवन। पार्टी अध्यक्ष से लेकर पुछल्ले तक, सभी जोश में थे। दादा से मिले। लौटे। बयानबाजी की। गेंद उनके पाले में। कांग्रेस किंकर्तव्यविमूढ़। गेंद को जाती देख रही थी। लेकिन वो कांग्रेस ही क्या जो राजनीति को अपने हिसाब से न चलाए। बन गई रणनीति। सज गई दुकान। राहुल जी ने मोर्चा संभाला। सीधे प्रेस क्लब। पूरे देश का मीडिया जुटता है यहां। कोई दिक्कत नहीं। राहुल के नाम पर कुछ और आ गये। रुके नहीं राहुल। आये। बोले। चले गये। बवाल पीछे छोड़ गये। बकवास अध्यादेश। फाड़ देना चाहिए। देश में बकवास अध्यादेश पर बवाल हो गया। अखबारों में पहले पन्ने पर खबर छापने की तैयारी हो रही थी। हर समाचार चैनल पर बहसबाजी हो रही थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमेरिका में राष्ट्रपति ओबामा से मिल रहे थे। बकवास अध्यादेश पर बवाल सुना तो आवाज हलक में ही रह गई। वैसे भी, वे यहां तो बोलते नहीं हैं, लेकिन पहली बार हुआ कि बाहर भी बोलने में मुश्किल हो रही थी। लेकिन यहां कांग्रेसी नेता बेखौफ बोल रहे थे। राहुल की हां में हां मिला रहे थे। ना मिलाते तो करते क्या ? कांग्रेस पार्टी और सरकार में पद पाना और बात है। पद को बचाए रखना और बात। चापलूसी भी कोई चीज होती है ना! अगर वो नहीं आती तो राजनीति (!) कैसे करते ? रातोंरात राहुल हीरो हो गये। जनता का दिल जीत लिया। प्रधानमंत्री ने भी राहुल की बात को जनता की बात मान कर माथे से लगाया। याद आई लोकपाल के लिए अन्ना की लड़ाई की। तब तो लोग भी थे। नहीं सुनना था, नहीं सुनी गई। लेकिन राहुल के पीछे कौन लोग थे भाई ? जनता को कौन समझाए ? ये राजनीति की रणनीति है भैया। जो दिखता है, वो होता नहीं है और जो हो जाता है, उसका पता भी नहीं चलता। फिर राहुल को नेता भी तो बनाना है। अब तक तो सभी उन्हें बच्चा ही मानते थे। लेकिन उन्होंने बता दिया है कि गंभीरता से लेना सीख लो। कलावती को भूल गये तो क्या हुआ ? नियामगिरी की लड़ाई दिल्ली में नहीं लड़ सके तो क्या हुआ ? कुछ वादे करने के लिए भी किये जाते हैं। अब वे भी राजनीति सीख गये हैं। जी। अब राहुल सरकार से बड़े हो गये हैं। पार्टी ने उपाध्यक्ष बना कर पहले ही संकेत दे दिया था। लेकिन वे सरकार से बड़े हो जाएंगे, ये किसी ने नहीं सोचा था। विपक्ष के पाले से गेंद छीनकर अपनी ही सरकार को हिट विकेट कर दिया। सरकार बैकफुट पर। मुगालते में मत रहियेगा। अब बारी विपक्षी दलों की है। जिनने खुद भी कई दागी पाल रखे हैं। नंबर उनका भी आना है। बीजेपी के कई सांसद हैं, जिनके केस बीसियों साल से चल रहे हैं। समाजवाद का मुखौटा लगाए मुलायम सीधे तौर पर भले ही बच गये, लेकिन उनके भी कई चेले-चपाटी खतरे में हैं। सरकार की लंगड़ी कुर्सी को भले मायावती ने भी थाम रखा है, लेकिन नंबर उनके सांसदों का भी आना है। लालू यादव और राशिद मसूद साहब का हश्र आप देख चुके हैं। आजम खान हैं कि नेताओं को हो रही सजा पर भी दुख जता रहे हैं। दरअसल, ये हताशा है। निराशा है। आज कांग्रेस और उसकी गोद में बैठे लालू गये हैं। कल को औरों की भी बारी आ सकती है। लिस्ट कितनी भी लंबी हो सकती है। टू जी के तार चुराने का मामला हो, कॉमनवेल्थ गेम्स में हुए भ्रष्टाचार का या कोयला खदानों से निकली कालिख का, जो अभी तक सही चेहरे पर नहीं लग पाई है। सरकार से उपर पहुंच चुके राहुल गांधी ने रास्ता तैयार करवा दिया है। बलि के बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी ?



Rajan Kumar Agrawal
B-14, Surya Apartment
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Swaroop Nagar road
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Mob 9811343224
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बुधवार, 26 जून 2013

घीसू कैसे जाएगा उत्तराखंड?

प्रेमचंद के घीसू और माधव रात सपने में आये थे। कह रहे थे-बबुआ हमलोगन को भी उत्तराखंड दौरे पर जाना है.. कोई रास्ता बताओ। मैंने कहा- घीसू काका, तुम्हारा तो पता नहीं लेकिन माधव तो हो भी आया। घीसू काका चौंके। चौड़ी हो रही आंखों में सवाल था। मानों पूछ रही हों-कब?

मैंने जवाब दिया- माधव ने ही तो गांधी परिवार में जन्म लिया है काका। अब तो उसी का राज है। घीसू काका ईर्ष्या से जल भून रहे थे। वो भी जाना चाहते थे उत्तराखंड। बेटा हो आया था। कंपीटिशन था। ठीक वैसा ही जैसा दोनों बाप-बेटों के बीच गरमा गरम आलू भकोस लेने का था (गर्भवती बहू अंदर प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी, लेकिन उसकी चिंता दोनों को नहीं थी)

पुनश्च: घीसू माधव चाहे जिसे समझिए, लेकिन प्रसव पीड़ा से तड़प रही गर्भवती बहू तो वहां फंसी जनता ही है...

मंगलवार, 25 जून 2013

'आफत के बीच मेले सा रोमांच!'

बौरा गया मीडिया... राहुल जी गुप्तकाशी में हैं... सुना फंस गये हैं... अब वे खबरों में हैं... पीड़ित पीछे छूट गये भैया... सब तरफ राहुल ही राहुल...
हे भगवान, कोई कुछ देता क्यों नहीं... कोई इनको समझाता क्यों नहीं.. गये क्यों थे... लाव लश्कर के साथ... तामझाम से लैस होकर... कोई मेला थोड़े ना लगा था कि बच्चे ने जिद कर ली... 'हमें तो मेला देखने जाना है और मां ने हिदायत देकर भेज दिया। बेटा, ध्यान से जाना। पानी बरस रहा है, पैर ना फिसल जाए!'

अरे! किसी ने मां को ही बता दिया होता- 'बहन जी, मेला नहीं लगा। आफत आई है... घूमने के लिए विदेश में जगह कम है क्या जो उत्तराखंड भेज रही हैं...' लगता है कांग्रेस के रागदरबारियों में ये सलाह देने की भी हिम्मत नहीं बची। और रही सही कसर मीडिया ने पूरी कर दी। राहुल बाबा फंस गये ... गुप्तकाशी में फंसे राहुल बाबा - ब्रेकिंग न्यूज हो गई है। टीवी को क्या चाहिए... एक अदद चेहरा.. और राहुल से खूबसूरत और कुंवारा चेहरा कौन है? चेहरा चमका रहे हैं टीवी वाले... पीड़ितों की खबर ब्रेक के बाद...

(विषयांतर) सलमान खान ही हैं.. वो भी चर्चा में ही हैं