शनिवार, 26 मई 2012

शर्मसार हरियाणा


        बलात्कार और भ्रूण हत्या। दोनों पाप। दोनों हो रहे हैं। दुखद हैं। चुनौतीपूर्ण भी। हाशिाए पर जा रही हैं महिलाएं। युवतियां। बच्चियां। कोख में पल रही बेटियां भी जन्म लेने से पहले ही मार दी जाती हैं। शर्मसार हो रहा है हरियाणा। बदनामी किसे अच्छी लगती ह, लेकिन हकीकत यही है। बलात्कार और भ्रूण हत्याओं की खबरें पूरे प्रदेशा से आ रही हैं। कहीं छात्रा से बलात्कार तो कहीं शादीशुदा महिलाओं से। दरिंदगी की हद। वृद्ध महिलाएं भी वासना के भूखों की शिकार बन रही हैं। छुट्टा घूम रहे हैं मनचले। कोई रूकावट नहीं।




       देश के समृद्ध राज्यों में से एक है हरियाणा। यहीं खुला था देश का पहला महिला विश्वविद्यालय। भक्त फूलसिंह महिला विश्वविद्यालय, खानपुर कलां, सोनीपत। इन दिनों ये विश्वविद्यालय सुर्खियों में है। किसी उपलब्धि को लेकर नहीं, बल्कि एक छात्रा से सामूहिक बलात्कार की वजह से। बीए एलएलबी की एक छात्रा के साथ गैंग रेप किया गया है। विवविद्यालय में मेस चलाने वाले अमित मलिक उर्फ मीता पर दो दोस्तों के मिलकर इस शर्मनाक घटना को अंजाम देने का आरोप है। मामला 16 मई का है, जब छात्रा विवविद्यालय के गेट पर किसी काम से गई थी। अमित मलिक ने अपने साथियों के साथ मिलकर उसे जबरन उठा लिया। खेतों में ले जाकर उसके साथ बारी बारी से रेप किया। हवस की आग बुझाने के बाद छात्रा को यूनिवर्सिटी के गेट पर फेंक कर चले गये।

छात्रा सदमे में थी। किसी से कुछ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा सकी। अगले दिन 17 मई को उसने अपने साथ हुए दुराचार की बात अपनी दोस्तों को बताई। एक कान से दूसरे कान होते होते बात पूरे विवविद्यालय में आग की तरह फैल गई। छात्राएं एकजुट हो गईं। आवाज उठाई। विवविद्यालय प्रशासन मामले को दबाकर साख बचाने में जुट गया। इसकी भनक मिलते ही छात्राओं ने विरोध की रणनीति अपनाते हुए गोहाना-गन्नौर रोड पर जाम लगा दिया। दबाव बढ़ा। चीफ वार्डन साहिब कौर से त्याग पत्र ले लिया गया। लेकिन लड़कियों को न्याय चाहिए था। आवाज और बुलंद हुई। चंडीगढ़ तक पहुंची। गृह राज्यमंत्री गोपाल कांडा ने इस शर्मनाक हरकत की निंदा की और छात्राओं को कार्रवाई का भरोसा दिलाया। गोपाल कांडा ने कहा, ‘इस घटना की पूरी तहकीकात की जाएगी। और इस शर्मनाक घटना के पीछे जो भी दोषी पाया जाएगा उसे सरकार बख्शेगी नहीं। गृह राज्यमंत्री के बयान के बाद पुलिस पर दबाव बढ़ गया था। आनन फानन में तीनों आरोपियों को दबोच लिया गया। लड़कियां इतने से ही मानने वाली नहीं थीं। उन्होंने आरोपियों को देखने की जिद की। पुलिस को मानना पड़ा। विवविद्यालय के बाहर प्रदर्ान कर रही छात्राओं में से कुछ को दो गाडि़यों में ले जाकर आरोपियों को दिखाया गया। पुलिस को इस बात का डर भी था कि अगर तीनों आरोपी उग्र लड़कियों के हाथों में पड़ गये तो मुसीबत हो जाएगी। वहीं, अलग अलग बयानों की वजह से पुलिस भी सवालों के घेरे में है। पहले कहा गया कि तीनों को खानपुर कलां गांव से ही पकड़ा गया है। बाद में कहा - हरिद्वार से गिरफ्तार किया गया।


हालांकि आरोपियों को दिखाने के बाद प्रशासन ने छात्राओं से आंदोलन खत्म करने की अपील की। लेकिन लड़कियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन और सरकार को भी कटघरे में खड़ा कर दिया। चीफ वार्डन के इस्तीफे के बाद अब इन्होंने कुलपति को भी हटाने की मांग की है। शुक्रवार-शनिवार (18-19 मई) की रात लड़कियां सड़क पर ही जमी रही।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने आंदोलन करने वाली इन लड़कियों को दबाने की पूरी कोशिश की। बात नहीं बनी। लड़कियों को रात का खाना नहीं दिया गया। शर्त रखी गई कि जब वे हाॅस्टल में आएंगी तभी खाना मिलेगा। लड़कियों ने शर्त ठुकरा दी। रात में सड़क पर भूखे प्यासे रह कर पीडि़त छात्रा को न्याय दिलाने के लिए आवाज बुलंद करती रहीं। भक्त फूल सिंह महिला विवविद्यालय के हाॅस्टल में रहने वाली तीन छात्राएं फरवरी और मार्च महीने में फंदा खुदकुशी कर चुकी हैं। लेकिन इसकी वजह क्या थी, इसका पता नहीं चल पाया है। ऐसे में एक के बाद एक घटनाओं ने विपक्ष को एक और मौका दे दिया। मुख्य विपक्षी दल इनेलो के प्रधान महासचिव अजय चैटाला 19 मई (शनिवार) को महिला विश्वविद्यालय पहुंच गये। सरकार पर हमले किये। छात्राओं को साथ देने का भरोसा दिलाया। उन्होंने कहा, ‘अगर महिला विश्वविद्यालय की छात्राओं के साथ बलात्कार हो, आत्महत्या करने की घटना घटे, तो बजाए इंसाफ दिलवाने के, बजाए दोषी लोगों को सजा देने के उन्हीं से जांच करवाई जाती है और उनको बचाने का काम किया जाता है। अब बच्चियों ने सीधे तौर पर कहा है कि वीसी के रहते इस तरह की कई घटनाएं घटी हैं। रजिस्ट्रार, वीसी और हाॅस्टल वार्डन की जरूरत नहीं है।अजय चैटाला ने मामले की जांच हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज से करवाने की भी मांग की।
वहीं, इस मामले में जब हरियाणा महिला आयोग की चेयरपर्सन सुशीला शर्मा से बात की गई तो उन्होंने प्रशासन की तारीफ में कसीदे ही पढ़े। उन्होंने कहा, ‘आरोपियों को पकड़ लिया गया है। प्रशासन ने तत्परता दिखाई है। आज समाज के हर तबके से कहना चाहेंगे कि जितनी नैतिकता की जरूरत है, उसे बचाए और बनाए रखने की कोशिश करें। जो उद्दंडता समाज में आ गई है उसे दूर करने की जरूरत है। युवाओं को नैतिकता और सद्गुण के पाठ पढ़ाए जाने चाहिए। समाज के सभी वर्ग के लोगों को दल, जाति, धर्म से उपर उठकर इसके लिए कोशिश करनी चाहिए। ताकि इस तरह की घटनाएं रोकी जा सकें।बजाए इसके कि वे ठोस कार्रवाई की मांग करतीं, समाज से उम्मीद कर रही हैं। उस समाज से जो रोज अपने प्रतिनिधियों से नित नये सबक सीख रहा है।

दरअसल, हरियाणा में छात्राओं से बलात्कार का ये कोई पहला मामला नहीं हैं। आए दिन प्रदेषा के किसी न किसी इलाके से बलात्कार की खबरें आती रहती हैं। आप यकीन नहीं कर पाएंगे लेकिन ये सच है। जनवरी के आखिरी सप्ताह में 80 साल की एक वृद्ध महिला के साथ बलात्कार किया गया। रेवाड़ी से 12 किलोमीटर दूर नांगल गांव में 35 साल के एक शादीशुदा युवक की इस हरकत ने प्रदेष को शर्मसार कर दिया। मार्च में भिवानी में पड़ोसी ने ही एक नाबालिग की अस्मत तार-तार कर दी। अप्रैल में ही पानीपत में 5 साल की बच्ची से दुकर्म किया गया। मई के पहले हफ्ते में ही फतेहाबाद में 7 साल की एक बच्ची के साथ 60 साल के बुजुर्ग ने बलात्कार किया। एक के बाद एक कई खबरें आईं। लेकिन किसी में भी कार्रवाई नहीं हुई। हां, गुड़गांव में एक युवती से सामूहिक बलात्कार के सभी 6 आरोपियों को पुलिस ने 15 दिनों के भीतर जरूर पकड़ लिया था। ये मार्च के दूसरे हफ्ते की घटना है। युवती गुड़गांव के एक माॅल के बाहर टैक्सी में सवार हो रही थी। तभी कुछ युवकों ने उसे उठा लिया और एक फ्लैट में ले जाकर गैंग रेप किया। इस घटना के बाद भी गुड़गांव पुलिस सचेत नहीं हुई थी। क्योंकि इसके अगले ही दिन एक और महिला के साथ बलात्कार की खबर आई।

ये तो हुई छात्राओं, युवतियों और महिलाओं की बात। जो प्रदेषा सरकार की पोल खोलने के लिए काफी है। प्रदेष में बच्चियां भी सुरक्षित नहीं हैं। खास तौर से वे बच्चियां जो किसी अनाथ आश्रम में रहती हैं। ऐसे ज्यादातर अनाथ आश्रम कोई न कोई एनजीओ चलाता है। इन अनाथ आश्रम में रहने वाली बच्चियों का जमकर यौन शोषाण किया जाता है। गुड़गांव के वजीराबाद गांव में चल रहे अनाथ आश्रम सुपर्णा का आंगनमें रहने वाली अनाथ नाबालिग बच्चियों का यौन शोषण उनके केयर टेकर रचित राज ने ही किया था। जबकि सीएम सिटी रोहतक में अपना घरनाम से चलने वाली एक और संस्था में बच्चियों और युवतियों के संरक्षण के नाम पर यौन शोषण, शारीरिक उत्पीड़न का सनसनीखेज मामला पिछले हफ्ते ही सामने आया है। राष्ट्रीय बाल संरक्षण परिषद की टीम ने छापा मारा तो कई अनियमितताएं देखने को मिलीं। यहां रहने वाली बच्चियों ने जरा सी सहानुभूति पाई तो फट पड़ीं। जबरन काम करवाना तो समझा जा सकता है। लेकिन अधिकारियों को यकीन ही नहीं हुआ जब बच्चियों ने जिस्मफरोशी करवाने की शिकायत भी की। ये भी बताया कि कुछ युवतियों को छापे से एक दिन पहले ही दिल्ली पहुंचाया गया है।

संचालिका जसवंती, उसकी बेटी सिमी, दामाद जय भगवान और उसके ममेरे भाई सतीश को गिरफ्तार कर लिया गया है। लेकिन दोनों ही मामलों में क्या सिर्फ गिरफ्तारी से बात खत्म हो जाएगी? नहीं। आखिर प्रशासन की भी लापरवाही है। ऐसे में रोहतक प्रशासन को राष्ट्रीय बाल संरक्षण परिषद की टीम ने तलब कर लिया।
मामला दिल्ली तक पहुंच गया था। लेकिन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को इतनी फुरसत नहीं थी कि अपना घरका परायापन देख आते। देख आते कि इस तरह के आश्रम चलाने वाले एनजीओ को सरकार जो पैसा दे रही है, उसका सही इस्तेमाल हो भी रहा है या नहीं। सिर्फ हुड्डा साहब को ही क्यों दोष देना। किसी भी राजनीतिक दल के नेता ने यहां कदम रखना उचित नहीं समझा। तब समझ में आया कि महिला विश्वविद्यालय की छात्रा से गैंग रेप के बाद गृह राज्यमंत्री गोपाल कांडा ने क्यों बयान दिया। इनेलो के प्रधान महासचिव अजय चैटाला क्यों खानपुर कलां पहुंच गये। मामला छात्राओं का था। उनके परिजनों के रूप में वोट बैंक है। लेकिन अनाथ आश्रमों में रहने वालों के पीछे कौन है ? जनवादी महिला समिति ने अगर मोर्चा नहीं खोला होता तो रोहतक का मामला ठंडा भी पड़ गया होता। समिति की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जगमती सांगवान ने अपना घरको ग्रांट देने में शामिल होने वाले अधिकारियों की भी न्यायिक जांच की मांग की है ताकि असलियत सामने आ सके।

बच्चियों, युवतियों, या फिर वृद्ध महिलाओं के साथ बलात्कार की वजह क्या है? हरियाणा समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष सुमित्रा चैहान का मानना है कि प्रदेश में असंतुलित लिंगानुपात की वजह से कई समस्याएं जन्म ले रही हैं। लड़कियों की कम संख्या के कारण बलात्कार और आपराधिक घटनाएं बढ़ रही हैं। प्रदेश के किसी न किसी हिस्से में कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए लगातार कार्यक्रम चलते रहते हैं। सरकारी स्तर पर और सामाजिक स्तर पर भी। लेकिन कुछ खास फायदा होता नहीं दिखाई देता। 2001 के मुकाबले 2011 में बच्चियों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है।

दरअसल, हरियाणा का लिंगानुपात देश के लिंगानुपात से काफी पीछे है। 2011 की जनगणना के हिसाब से प्रदेश में 1000 लड़कों के पीछे सिर्फ 877 लड़कियां हैं। हालांकि हरियाणा में लिंगानुपात 2001 के मुकाबले बेहतर हुआ है। 2001 में 1000 लड़कों पर सिर्फ 861 लड़कियां थीं, जिनकी संख्या बढ़कर 877 हो गई है। लेकिन बच्चों के लिंगानुपात में भारी गिरावट दर्ज की गई है। 2001 में 1000 बच्चों (0-6 साल तक) में 964 बच्चियां थीं, जबकि 2011 में इनकी संख्या 830 तक पहुंच गई है।

यानि अभी भले ही 1000 लड़कों पर 877 लड़कियां हों, लेकिन आने वाले कुछ वर्षों में स्थिति भयावह हो सकती है। क्योंकि 0 से 6 साल तक के बच्चों के मामले में लड़कियों की संख्या चिंताजनक है। पिछले 30 वर्षों में देश भर में कन्या भ्रूण हत्या की वजह से बच्चियों की संख्या में भारी गिरावट आई है।

एक तरफ प्रदेशा अपनी बेटियों पर गर्व करता नहीं अघाता। हरियाणा की बेटियां सेना के तीनों अंगों में जा रही हैं। पुलिस सेवा में भर्ती हो रही हैं। देश और राज्य की सेवा-सुरक्षा कर रही हैं। खेल की दुनिया में भी इन्होंने अपना दबदबा बनाया है। राजनीति में भी रसूख रखती हैं। राज्य में तो मंत्री बनीं ही हैं, केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी हरियाणा की बेटियों की दखलअंदाजी है। अंतरिक्ष और एवरेस्ट पर तिरंगा फहरानी वाली बेटियां भी हरियाणा की ही हैं। इस साल आई ए एस की परीक्षा में टाॅप करनी वाली लड़की भी यमुनानगर की है। यानी किसी भी क्षेत्र में यहां की बेटियां पीछे नहीं हैं। फिर भी यहां कन्या भ्रूण हत्या के सबसे ज्यादा मामले सामने आते हैं। पिता का सिर उंचा करने वाली बेटियों को कोख में ही मार दिया जाता है। वंश चलाने के लिए एक बेटे की चाहत में पता नहीं कितने लोग इतना बड़ा पाप करते हैं। लेकिन सोचते नहीं कि अगर बेटियों से ये भेदभाव किया गया तो बहू कैसे आएगी ? वंश कैसे चलेगा ? इस दिशा में कौन सोचेगा? क्या अकेला बेटा ही वंश चला पाएगा ? सुमित्रा महाजन कह चुकी हैं कि असंतुलित लिंगानुपात की वजह से ही बलात्कार और आपराधिक घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे में आंकड़ों के बरक्स उठने वाले सवालों का जवाब भी आंकड़े ही देंगे। जब स्थिति पहले जैसी हो जाएगी। बेटियों के साथ भेदभाव छोड़ कर उन्हें पैदा होने दिया जाएगा। वहीं बलात्कार से बचने के लिए लड़कियों को भी खुद को मजबूत करना होगा। आत्मरक्षा के उपाय सीखने होंगे। प्रशिक्षण लेना होगा। ताकि कभी विकट स्थिति आने पर खुद ही उससे निपट सकें। उन्हें किसी का मोहताज नहीं होना पड़े।



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मंगलवार, 22 मई 2012

फिर सड़ने के लिए तैयार है गेहूं

                  ‘मेहनत की कमाई है, बेकार कैसे जाएगी।’ ये बात आपने भी जरूर सुनी होगी। लेकिन हरियाणा पहुंचते ही ये बात गलत साबित होने लगती है। गेहूं की फसल के लिए प्रदेश के किसान जमकर मेहनत करते हैं। कड़ी धूप में पसीना बहाते हैं। और जब चमकदार कनक लेकर अनाज मंडियों में पहुंचते हैं तो उनकी मेहनत पर पानी फिरने लगता है। अनाज मंडियों की अव्यवस्था उनका गला घोंटने को तैयार दिखाई देती है। कभी समय पर खरीद शुरू नहीं होती। अगर खरीद हो जाए तो भुगतान नहीं होता। खरीद होने के बाद अनाज उठान की भी बड़ी समस्या है। जिसकी वजह से बाद में अनाज लेकर मंडी पहुंचने वाले किसानों को खासी दिक्कत का सामना करना पड़ता है। कई बार तो पूरा हफ्ता इंतजार में बीत जाता है। किसानों के लिए समस्या तब और विकट हो जाती है, जब मौसम उनके प्रतिकूल हो जाता है। प्रदेश की कई अनाज मंडियों में किसानों के बैठने के लिए शेड तक नहीं होती, ऐसे में अनाज रखने की व्यवस्था कैसी होगी ये बताने की जरूरत नहीं है। अगर दो चार बूंदे भी पड़ गयी तो किसानों के लिए लागत निकालना भी मुशि्कल हो जाता है।
    किसानों को अनाज उपजाने से लेकर मंडियों तक पहुंचाने में कोई दिक्कत नहीं होती। असल दिक्कत मंडी पहुंचने के बाद ही शुरू होती है। जब उन्हें वहां खरीद के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। इस बार भी सरकार ने 1 अप्रैल से अनाज खरीद की घोषणा की थी। किसान अपनी उपज लेकर मंडियों में पहुंचने लगे थे लेकिन 7 दिनों तक सरकारी खरीद एजेंसियों का रवैया लापरवाही वाला ही रहा। हालांकि छह सरकारी एजेंसियां गेहूं खरीद रही हैं। इनमें खाद्य और आपूर्ति विभाग, हैफेड, कॅान्फेड, हरियाणा वेयर हाउसिंग काॅरपोरेशन, हरियाणा एग्रो इंडस्ट्रीज काॅरपोरेशन और फूड काॅरपोरेशन अॅाफ इंडिया शामिल हैं। इसके बावजूद किसान बार बार गेहूं नहीं खरीदे जाने की बात कहते हैं। समस्या सिर्फ यही नहीं है। जिन किसानों के गेहूं खरीद लिये गये हैं, उन्हें भुगतान नहीं हुआ है। और जो किसान बाद में मंडी पहुंच रहे हैं, उनके सामने खरीद की ही समस्या है। क्योंकि पहले खरीदे गये अनाज का समय पर उठान नहीं हो पा रहा है। जिसकी वजह से मंडियों में अनाज रखने की जगह ही नहीं बची है। प्रदेश में तमाम तरह के गोदामों को मिला कर कुल 90 लाख टन अनाज रखने की क्षमता है। लेकिन यहां के गोदामों में पहले से ही 50 लाख टन अनाज पड़ा है। ऐसे में इस बार खरीद होने के बाद अनाज कहां रखा जाएगा ये सबसे अहम सवाल है। देश के प्रमुख कृषि उत्पादक राज्य हरियाणा में इस बार गेहूं की बंपर पैदावार हुई है। इस बार यहां 70 लाख टन गेहूं पैदा होने की उम्मीद है। 

                        पिछले दो तीन वर्षौं से हम हरियाणा में ही कई जगहों पर अनाज की बर्बादी की कहानी देख और सुन चुके हैं। बारिश और बाढ़ की वजह से रानियां, पानीपत और करनाल सहित कई जगहों पर गेहूं सड़ गया था। इसके बावजूद सरकार नहीं चेती। खरीद के बाद भंडारण की व्यवस्था करने की बजाए जैसे तैसे खरीद बढ़ाने पर जोर दे दिया गया। खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री महेंद्र प्रताप सिंह का कहना है कि, ‘‘सरकारी खरीद के मामले में हरियाणा का सिस्टम सबसे बेहतरीन सिस्टम है। 27 अप्रैल तक करीब 60 लाख टन गेहूं की खरीद हो चुकी है। जगह बनते ही किसान का एक एक दाना खरीद लिया जाएगा। किसान का हित सरकार के लिए सर्वोपरि है।’’ सरकार और उसके मंत्री अपनी ही पीठ थपथपाने में लगे हैं। दौरे पर दौरे हो रहे हैं। सहकारिता मंत्री सतपाल सांगवान तोशाम अनाज मंडी जा रहे हैं तो उन्हें ” शिकायतें सुनने को मिल रही हैं। खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री करनाल की अनाज मंडी में लिफ्टिंग में तेजी लाने का आदेश दे रहे हैं। कई और मंत्री दौरे पर दौरा कर रहे हैं, लेकिन नतीजा सिफर है।

                       मंडियों में खुले में पड़े अनाज के उठान के लिए कोई पुख्ता बंदोबस्त नहीं दिखाई पड़ता। कुछ जगहों पर अनाज रखने के लिए शेड तो हैं लेकिन इनकी संख्या काफी कम है। जिसकी वजह से खरीद का ज्यादातर हिस्सा खुले में ही पड़ा है। बारिश से बचाने के लिए गेहूं के बोरों पर तिरपाल डाल दी जाती है। लेकिन हर जगह ऐसा कर पाना भी मुमकिन नहीं हो पा रहा है। सरकार को किसानों की चिंता है। एक एक दाना खरीदे जाने की बात बार-बार कहती है। लेकिन खरीदे गये गेहूं की फिक्र जरा भी नहीं दिखाई देती। और इंडियन ने”ानल लोकदल इस मुद्दे पर सरकार को घेरने का मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहती। पार्टी के प्रधान महासचिव अजय चैटाला कहते हैं, ‘‘मंडियों में अव्यवस्था फैली है। जिसकी वजह से किसानों का गेहूं भीग रहा है। इस (हुड्डा) सरकार को किसानों के हितों का जरा भी ख्याल नहीं है। सरकार किसानों को बर्बाद करने पर तुली हुई है।’’
हालांकि खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री महेंद्र प्रताप सिंह कहते हैं- ‘‘हरियाणा सरकार का मार्केटिंग सिस्टम सबसे बढि़या है इसलिए यूपी का किसान भी अपना गेहूं यहां लाना चाहता है। लेकिन हमारा कर्तव्य है कि यहां के किसान के गेहूं को पहले खरीदें।’’ दरअसल उत्तर प्रदेश के किसान दाम में अंतर की वजह से अपना गेहूं यहां लाते हैं। यूपी में जहां गेहूं का समर्थन मूल्य 1140 रुपये क्विंटल है, वहीं हरियाणा में 1285 रुपये। और जब हरियाणा की सीमा कई जगहों पर ( सोनीपत, पानीपत, करनाल) यूपी से लगती है तो किसान इसका फायदा क्यों नहीं उठाना चाहेगा। हालांकि हरियाणा सरकार ने फिलहाल यूपी से आने वाले गेहूं की खरीद पर रोक लगा रखी है।

अगर सरकार की मानें तो अब तक 60 लाख टन अनाज खरीदा जा चुका है। लेकिन स्टोरेज की व्यवस्था नहीं होने से खुले आसमान के नीचे पड़ा है। मानों बारिश का ही इंतजार कर रहा हो। एक तरफ तो देश की आधी से ज्यादा आबादी को दो जून की रोटी नसीब नहीं है। वहीं दूसरी तरफ हरियाणा में स्टोरेज की कमी की वजह से लाखों टन गेहूं सड़ने के लिए तैयार है।



नोट -
देश के कुल गेहूं उत्पादन में हरियाणा का योगदान 13;3 प्रतिशत है। जबकि गेहूं उत्पादन भूमि का सिर्फ 8;9 फीसदी हिस्सा ही प्रदेश के पास है।


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सोमवार, 26 दिसंबर 2011

कुछ होने के इंतजार में....

नया साल आने वाला है। हर व्यक्ति बड़े उत्साह से 2012 का इंतजार कर रहा है। सबके अपने सपने हैं। नव वर्ष की पूर्व संध्या के लिए अपनी-अपनी योजनाएं हैं। किसी को शहर से बाहर जाकर नये साल का स्वागत करना है। तो किसी को अपने घर में। किसी को दोस्तों के साथ पार्टी करनी है तो कोई सड़कों पर घूमते हुए उस शाम को सेलिब्रेट करना चाहता है। जितने मन हैं, उतनी योजनाएं हैं। 31 दिसंबर की शाम वातावरण खुशनुमा होगा। मौसम में भी मस्ती होगी। युवा दिल अल्हड़ होने को मचल रहा होगा। बिना दुनिया की परवाह किये प्रेमी युगल गलबहियां डालने का इंतजार कर रहे होंगे। खुमारी सिर पर सवार होने को होगी। खुशी के मौके पर जाम छलकाने वाले दिन ढलने का इंतजार कर रहे होंगे। सब अपनी तैयारियों में जुटे हैं।
2011 का आखिरी सप्ताह बीत रहा है। लेकिन दिल्ली की शान कही जाने वाली मेट्रो न जाने क्यों महिलाओं के लिए असुरक्षित सी लगने लगी है। हालांकि दिल्ली मेट्रो रेल काॅरपोरेशन ने पहला डब्बा महिलाओं के लिए आरक्षित कर रखा है। इस डब्बे में पुरुषों के चढ़ने पर सख्त मनाही है। जबरन चढ़ने वालों पर कई बार जुर्माना भी लगाया गया है। एनसीआर में तो मनचलों को मुर्गा तक बनाया गया। लेकिन जैसे इतना सब ही काफी नहीं है। रात नौ बजे के बाद इस डब्बे में मनचले, खासतौर पर शोहदे किस्म के लोग देखे जा सकते हैं। जिनसे डर कर महिलाओं को जैसे खुद में ही सिमट कर बैठना पड़ता है। इनमें से कुछ तो नशा करके मेट्रो में सवार होते हैं। अपने आराम के लिए दूसरे की बहन-बेटियों की परेशानी इनके लिए कोई मायने नहीं रखती। इसलिए ये महिला डब्बे का रूख कर लेते हैं। लेकिन इनके मुहं से आती शराब की गंध और इनकी गंदी नजरें काफी कुछ कह रही होती हैं। कई बार सीआरपीएफ के जवान राजीव चैक या कश्मीरी गेट पर इन्हें महिलाओं के लिए आरक्षित डब्बे से बाहर निकालते भी हैं, लेकिन स्टेशन से ट्रेन के चलते ही ये लोग फिर उसी डब्बे की ओर बढ़ जाते हैं।
पता नहीं क्यों, डीएमआरसी ने मेट्रो ट्रेन में सुरक्षा बलों को रखना बंद कर दिया है। काॅमनवेल्थ खेलों के समय तो पूर्वोत्तर राज्यों से महिला कमांडोज को विशेष रूप से बुलाया गया था। क्या वो अभियान सिर्फ विदेशी मेहमानों को दिखाने के लिए था? या सिर्फ विदेशी महिला मेहमानों की सुरक्षा के लिए था? अपने घर, समाज, राज्य या देश की महिलाओं की सुरक्षा के लिए नहीं? कभी रात में मेट्रो का सफर करके देखिए, दिल्ली की महिलाएं, युवतियां कितनी जिल्लत झेलती हुई सफर करती हैं। ऐसा रोज होता है। लेकिन पता नहीं क्यों, किसी का ध्यान इस पर नहीं जाता। या जाता भी है तो ‘सब चलता है’ को ही परम सत्य मान कर आंखें मूंद ली जाती हैं। मेट्रो को आतंकवादियों का निशाना बनने से रोकने के लिए ही सीआरपीएफ की तैनाती की गयी थी, लेकिन मेट्रो में सफर करने वाली महिलाओं के मन में बैठे आतंक को खत्म करने के लिए दिल्ली सरकार या दिल्ली मेट्रो रेल काॅरपोरेशन क्या कदम उठाएगा? या इसके लिए उस दिन का इंतजार करेगा, जब किसी के साथ अनहोनी हो जाएगी? और दोष फिर देर रात सफर करने वाली महिलाओं और युवतियों पर मढ़ कर सरकार, प्रशासन और पुलिस अपने कर्तव्य का इतिश्री कर लेंगे।
नये साल की जितनी तैयारी युवा मन कर रहा है, उतनी ही तैयारी सुरक्षा एजेंसियों को भी करनी चाहिए। चाहे वो दिल्ली पुलिस हो या मेट्रो में तैनात सीआरपीएफ। या फिर यात्रियों को निर्देशित करने के लिए मेट्रो स्टेशनों पर तैनात निजी सुरक्षाकर्मी। कहीं ऐसा ना हो कि नये साल से पहले किसी ऐसे वाकये का सामना करना पड़े, जिसे थोड़ी सी मुस्तैदी से ही टाला जा सकता है। बाद में अफसोस जताने से अच्छा है कि पहले ही थोड़ी परेशानी उठा ली जाए। और नव वर्ष का स्वागत हंसी-खुशी किया जाए। थोड़ी सख्ती भी दिखानी पड़े तो इसे सहने के लिए युवा मन को तैयार रहना चाहिए।

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

भारतीय जेलों का अपमान ?

डेनमार्क से खबर आई है कि पुरूलिया में हथियार गिराने के आरोपी किम डेवी का भारत प्रत्यर्पण नहीं हो सकता। इसलिए नहीं कि कोई कानूनी मजबूरी है, बल्कि इसलिए कि यहां की जेलों की हालत अच्छी नहीं है। यहां की जेलों में कैदियों के मानवाधिकार का ख्याल नहीं रखा जाता है। जी हां, ये कहना है डेनमार्क की हाईकोर्ट का, जिसने इसी आधार पर सीबीआई की याचिका खारिज कर दी। अब कोई कैसे समझाए, कि इस बात से भारतीय जेलों का कितना बड़ा अपमान हुआ है? जिन जेलों को भारतीय मंत्रियों, बड़े बड़े अधिकारियों को रखने का अवसर मिल चुका है, उनमें हथियार गिराने के आरोपी को भेजने से मना कर दिया। ये दुस्साहस नहीं तो और क्या है। गांवों-कस्बों में चले जाइए, हर दूसरे-तीसरे आदमी के पास हथियार मिल जाएगा। लाइसेंस हो या ना हो, ये अलग बात है। तो फिर किम डेवी की क्या औकात? ए. राजा, कनिमोझी, सुरेश कलमाड़ी, लालू प्रसाद यादव, पप्पू यादव, अमरमणि त्रिपाठी पता नहीं कितने राजनेता अपनी जेलों की शोभा बढ़ा चुके हैं। मनु शर्मा, विकास यादव जैसे युवा भी जेलों की शोभा बढ़ा रहे हैं। अबू सलेम और कसाब जैसे लोग भी अपनी जेलों में सुरक्षित हैं, तो फिर किम डेवी को क्या खतरा हो सकता है? जब हमने अपने लोगों के लिए जेल का मैन्यूअल बदल दिया तो इतना ख्याल तो किम डेवी का भी रखा ही जाएगा। जब साधारण दाल रोटी की जगह इडली, डोसा, सांबर और वड़ा बन सकता है तो किम के लिए नॉन वेज क्यों नहीं बनेगा? उसे दूसरी सुविधाएं क्यों नहीं मिलेंगी? इसलिए डरिए मत भेज दीजिए, क्योंकि दुनिया जानती है कि हम अपने मेहमानों की कितनी खातिरी करते हैं?

सोमवार, 13 जून 2011

इनका क्या कसूर...

चार जून की रात दिल्ली के रामलीला मैदान में दिल्ली पुलिस सत्याग्रह करने वालों पर लाठीचार्ज कर रही थी। आंसू गैस के गोले छोड़ रही थी। बाबा रामदेव के साथ सत्याग्रह कर रही समर्थकों की भीड़ को तितर बितर करने में लगी थी। वहीं दूसरी ओर दिल्ली से करीब तेरह सौ किलोमीटर दूर फारबिसगंज के भजनपुरा गांव में सन्नाटा पसरा था। बिहार के अररिया जिले के इस गांव में पुलिस का खौफ इस कदर छाया हुआ था कि सड़कें सूनसान पड़ी थीं। इस सन्नाटे का दिल्ली में हुए लाठीचार्ज से कोई लेना देना नहीं था। इसके पीछे दूसरी वजह थी। दिल्ली के रामलीला मैदान में जो कुछ हुआ, वो तो उस घटना के पासंग में भी नहीं ठहरती जो भजनपुरा गांव में हुई थी।
बिहार पुलिस के जवानों ने सड़क पर उतरी भीड़ पर दिनदहाड़े गोलियां बरसाई। नौ या दस महीने के बच्चे सहित पांच लोगों की मौत हो गयी। एक गर्भवती महिला भी पुलिस की बर्बरता की शिकार हुई। नौ साल का सोनू तो अपने रिश्तेदारों के साथ सड़क पर उतर गया था, उसे तो मालूम भी नहीं था कि हो क्या रहा है। इन सबके अलावा बाइस और तेइस साल के दो युवक भी पुलिस की गोली का शिकार बन गये। पुलिसकर्मियों की बर्बरता इतने पर ही नहीं थमी। पुलिसकर्मी इस कदर बौखलाए हुए थे कि जमीन पर बेसुध पड़े युवक को बूट से रौंदा गया। पुलिस वाले ने उसके हाथों पर बार बार छलांग लगाई। युवक इतना बेसुध था कि दर्द होने पर प्रतिक्रिया भी नहीं कर पा रहा था। ये बिहार पुलिस की नृशंसता की हद थी।
गांववालों की मानें तो पुलिस की इस दरिंदगी पीछे राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का हाथ है। दरअसल, भजनपुरा गांव में एक स्टार्च कंपनी बननी है। गांववालों की मानें तो इसे बनाने वाली ऑरो सुंदरम इंटरनेशलन कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर सौरभ अग्रवाल के पिता अशोक अग्रवाल और मोदी करीबी हैं। अशोक अग्रवाल बीजेपी के नेता भी हैं, सो उन्हें फायदा पहुंचाने के मकसद से मोदी साहब घटना से महज चार दिन पहले उनतीस मई को फारबिसगंज भी गये थे, जहां उन्होंने स्थानीय प्रशासन पर स्टार्च कंपनी लगाने में सहयोग करने के मकसद से भजनपुरा गांव जाने वाली सड़क को बंद करने का दबाव डाला था। जब उपमुख्यमंत्री ही कह रहा हो तो अधिकारी मना भी कैसे कर सकते थे,... उन्होंने मौखिक आदेश का पालन किया और सड़क बंद कर दी।
जिसके बाद लोगों के पास कोई रास्ता नहीं बचा था। वे सड़क पर उतर आए, और रास्ता बंद करने के लिए प्रशासन ने जो कुछ किया था, उसे उखाड़ फेंका। जिसके बाद बिहार पुलिस ने अपनी बंदूकों का मुंह खोल दिया, जिसने भीड़ में ना तो किसी का नाम देखा, ना उम्र और ना ही लिंग भेद किया। कुछ ही मिनटों में भीड़ तितर बितर हो गयी और पुलिस के खाते में जुड़ गयी पांच लाशें।
दिल्ली पुलिस ने सरकार के खिलाफ सत्याग्रह करने वालों पर लाठियां बरसाई, तो बीजेपी ने मोर्चा खोल दिया, लेकिन अब जबकि खुद बिहार बीजेपी के बड़े नेता आरोपों के घेरे में हैं, राज्य पुलिस पर सवालिया निशान लग रहा है, तब कोई कुछ नहीं कह रहा। भजनुपरा गांव के लोग ना तो किसी काले धन को वापस लाने की मांग कर रहे थे और ना ही भ्रष्टाचार मिटाने की। उनकी तो बस यही मांग थी कि उनके गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने वाली सड़क बंद ना की जाए। लेकिन प्रशासन पर ऊपर से दबाव था। उनके पास कोई विकल्प नहीं था, सो उन्होंने रास्ता बंद कर दिया, ये सोचे बगैर कि गांव वाले कैसे आना जाना करेंगे।
इस बात का खुलासा तब हुआ, जब स्थानीय चैनलों ने मामले को दिखाना शुरू किया। इसके बाद तो राज्य सरकार और पुलिस के खिलाफ कमजोर विपक्ष ने मोर्चा खोल दिया। कांग्रेस भी शामिल हुई। लेकिन ये सिर्फ शोशेबाजी है और कुछ नहीं। जिस प्रकार दिल्ली में हुए लाठीचार्ज को बीजेपी ने हाथोंहाथ लिया था, उसी तरह बिहार में दूसरे दलों की तरह कांग्रेस भी कोशिश कर रही है, लेकिन आधार कमजोर है, सो कुछ कर नहीं पा रही।
बहरहाल, चीन जाने से पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने न्यायिक जांच के आदेश दे दिए हैं, और इसकी रिपोर्ट का इंतजार है। बिहार में सुशासन का नारा देने वाली सरकार के आंकड़ें बताते हैं कि दो हजार दस तक करीब सैंतालिस हजार से ज्यादा अपराधियों को सजा मिली है। सरकार कहती है कि अब लोग अपराधियों से नहीं डरते, बल्कि अपराधी कानून से डरते हैं। लेकिन फारबिसगंज के भजनपुरा में हुई घटनाएं एक बार फिर वर्दी वालों को गुंडा साबित करती हैं, जिनके पीछे खाकी भी उतनी ही मुस्तैदी से जमी हुई है।