गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

हम कब सम्मानित होंगे?

सम्मानित होना और सम्मानित करना अपने आप में सम्मान की बात है। लेकिन कभी-कभी ये सम्मान कम और अपमान ज्यादा लगने लगता है। नहीं, नहीं। सम्मानितों का अपमान नहीं! जो सम्मानित नहीं हुए उनका अपमान। देखिए, अभी गणतंत्र दिवस पर देश के 128 शूरवीरों को पद्म सम्मान देने की घोषणा की गयी। तो उनकी त्योंरियां चढ़ गयीं, जो इस विस्तृत लिस्ट में जगह नहीं बना सके। विस्तृत इसलिए क्योंकि सरकार हर साल 120 लोगों को ही पद्म सम्मान देती है। बहरहाल, ये उनका सिरदर्द है कि कितनों को सम्मान देती है। हम तो ये बता रहे थे कि उन लोगों की त्योरियां चढ़ गयी जिन्हें ये सम्मान नहीं मिले। ना जी ना! प्रियंका चोपड़ा का नाम तो हम बिलकुल भी नहीं ले रहे, जिनका नाम टैक्स चुराने की वजह से कट गया। वो तो इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की ब्रांड अंबेसडर भी रहीं हैं। उनका नाम कैसे आ सकता है? उनका तो गलती से कट गया होगा!
आपने पद्म पुरस्कार पाने वालों की लिस्ट देखी क्या? सभी बड़े आदमी हैं। धनकुबेर कहिए। कईयों की तो अपनी बड़ी से बड़ी फैक्ट्रियां हैं तो कुछ बड़ी कंपनियों की देखरेख करते हैं। और तो और, विदेश में बस चुके लोगों को भी सरकार ने सम्मानित करने का फैसला किया है। इसे छोड़िए, लिस्ट तो कहीं भी मिल जाएगी। हम तो ये कह रहे हैं कि दुख उनको हुआ है, जो पैसेवाले नहीं हैं। जो गरीब हैं। जो किसी अधिकारी को नहीं पहचानते थे, जो पैरवी नहीं करवा सकते थे। इसके बावजूद जो देश का भार अपने कंधे पर उठाए हुए हैं। जिनके भरोसे इन धनकुबेरों को रोटी खाने को मिलती है। दरअसल वे लोग सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए ही पैदा हुए हैं, या फिर आत्महत्या करने के लिए। लेकिन उससे क्या फर्क पड़ता है कि पद्म पाने वाले में कोई किसान है या नहीं? कोई आम आदमी है या नहीं? वैसे भी इन्हें पूछता कौन है? हम तो कहते हैं कि किसानों को भी अपनी उपज की कीमत बढ़ा देनी चाहिए। फिर भले बढ़ती हो महंगाई तो बढ़ा करे। थोड़े पैसे आएंगे तो अमीरों की लिस्ट में तो शामिल होंगे। फिर पद्म पुरस्कार मिलने का चांस बढ़ जाएगा। करनी चाहिए। थोड़ी-बहुत कोशिश तो जरूर करनी चाहिए। कैसा हो अगर गेंहू एक हजार रूपये किलो और चावल पंद्रह सौ रूपये प्रति किलो मिलने लगे। आपकी जेब भले कटेगी लेकिन गरीब किसानों की उम्मीद तो बढ़ जाएगी। जैसे प्याज ने कुछ अमीर लोगों को और अमीर बना दिया उसी तरह गेहूं और चावल भी किसानों की कुछ नैया पार लगा देंगे। गरीबों का भला हो जाएगा!
अपने देश में सम्मानित करने और सम्मानित होने की एक अजब परम्परा रही है। अजब इसलिए कि कौन सम्मानित होगा और कौन सम्मानित करेगा, इसे लेकर एक बहस हमेशा से चलती रही है। पिछले साल दुनिया जीत कर आए पहलवान सुशील के साथ फोटो खिंचवाने से पहले तब खेल मंत्री रहे एम.एस. गिल ने उनके गुरू महाबली सतपाल को किनारे करवा दिया। उनके साथ फोटो ही नहीं खिंचवाई! साइना के कोच पुलेला गोपीचंद को पहचान ही नहीं पाए। गौर से देखिए, तो सम्मान और अपमान के बीच बहुत ही बारीक लाइन बन जाती है अपने यहां।
साहित्य और कला के क्षेत्र में तो हालत और ज्यादा खराब है। कभी सम्मानित होने वाले नखरे दिखाने लगते हैं तो कभी किसी को सम्मानित होता देखकर दूसरों के पेट में मरोड़ उठने लगती है। दरअसल ये सम्मान शब्द ही विवादास्पद होता जा रहा है। कई बार लगता है कि सम्मान देकर कहीं अपमानित तो नहीं किया जा रहा? यकीन मानिए, कई बार ऐसा होता है। तमाम अकादमियां इस तरह के उदाहरण पेश कर चुकी हैं।

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

क्या अब बदलेगी स्कूलों की तकदीर

.. बीसवीं सदी के आखिरी दशक की शुरुआत थी। बिहार के सरकारी स्कूलों में बच्चे नहीं दिखाई देते थे। तब लालू प्रसाद यादव ने चरवाहा विद्यालय जैसी शुरुआत की थी। असर भी हुआ। बच्चों को खाने के साथ साथ रूपये भी मिलते थे। बच्चों की संख्या बढ़ने लगी थी। समय तेजी से बदला। शहरवासियों के साथ साथ ग्रामीणों की सोच में भी बदलाव आया। बच्चों को पढ़ाने को प्राथमिकता दी जाने लगी। चाहे पेट काटकर ही सही, गरीब से गरीब किसान भी बच्चों को पढ़ाने के बारे में सोचने लगा। बच्चे स्कूल जाने लगे। जो प्राइवेट स्कूलों में नहीं भेज सकते थे, उन्होंने सरकारी स्कूलों की ही शरण ली। लेकिन सरकारी तंत्र और इसकी कार्यप्रणाली अपनी ही बनाई लीक पर चलती है। पहले स्कूलों में बच्चे नहीं थे, तो कोई बात नहीं थी, लेकिन जब बच्चे आए तो पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं मिले। उनके पास दूसरे भी काम थे। ट¬ूशन लेना, खेती-बाड़ी करना, साथ-साथ राशन की दुकान भी चलाना। यानी नौकरी के अलावा दूसरे पार्ट टाइम जॉब थे, जिसमें वे व्यस्त रहते। स्कूल जाकर हाजिरी लगाने के बाद स्कूल और देश के भविष्य के प्रति उनकी जिम्मेदारी खत्म हो जाती थी। लेकिन थे तो सरकारी नौकर ही। इसलिए सरकारी काम भी करने होते थे। चुनाव कार्य, जनगणना, पल्स पोलियो जैसे कितने ही अभियान इन स्कूलों के शिक्षकों के भरोसे ही चलते हैं। लेकिन पिछले दिनों पटना हाई कोर्ट के फैसले से उम्मीद है कि एक बार फिर देश का भविष्य उन्हीं प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च विद्यालयों में निखरेगा, जहां पढ़ाई को दोयम दर्जे का काम समझा जाता था। कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान फैसला दिया है कि अब प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों को अध्ययन-अध्यापन के समय में गैर शैक्षणिक कार्यों में नहीं लगाया जाएगा। यानी जब स्कूल खुले हों तो पढ़ाई को बाधित कर शिक्षकों को चुनाव कार्य, जनगणना, पल्स पोलियो या ऐसी अन्य जिम्मेदारियां नहीं दी जाएंगी। 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने भी संत मैरी बनाम एमसीडी मामले का हवाला देते हुए प्राथमिक स्कूलों के शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों में प्रतिनियुक्ति करने पर रोक लगाई थी। यानी अब उम्मीद की जा सकती है कि संविधान ने जिन छह से चौदह साल तक के बच्चों की पढ़ाई को अनिवार्य बनाया है उन्हें उनका हक मिल सकेगा। स्कूल खुला रहने पर शिक्षक गैर शैक्षणिक कार्यों में नहीं लगाए जाएंगे। बिहार में तो वैसे भी शिक्षकों की कमी का रोना हमेशा रोया जाता है। लेकिन नीतीश कुमार ने पहली बार बड़ी संख्या में शिक्षकों की बहाली करके एक बड़ा काम किया! ये अलग बात है कि उनके इस ‘बड़े काम’ की बड़ी आलोचना भी हुई। लेकिन बिहार के सरकारी स्कूलों का ये बड़ा सच है कि शिक्षक ‘सरकारी कार्यों’ के अलावा शिक्षण का काम कम ही करते हैं। उनके लिए स्कूल का खुला होना या नहीं होना कोई मायने नहीं रखता। अगर स्कूल खुला है तो बस हाजिरी लगाने से जिम्मेदारी खत्म हो जाती है, और अगर बंद है तो कोई बात ही नहीं। काम तो उन्हें चुनाव कार्य, जनगणना, पल्स पोलियो के लिए चलाए गये अभियानों में ही करना पड़ता है। ऐसे में हाईकोर्ट का ये फैसला शिक्षकों को स्कूलों में कितना टिका सकेगा, ये देखने वाली बात होगी।

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

आओ तो, भले पैसा मत देना

पैसा किसे प्यारा नहीं लगता? कोई है जो आती लक्ष्मी को ना कह सके? ऐसे इंसान विरले ही होते हैं। नहीं तो काहे का सादा जीवन और काहे का उच्च विचार? अपने यहां ही देखिए, आज कल यही हो रहा है। विदेश में रहने वाले भारतीयों को पहले तो बुलाया। उनका जमकर स्वागत किया, फिर कहते हैं हमें आपके पैसों से लगाव नहीं है। वो तो हम आपको जमीन से जोड़े रखना चाहते हैं, बस इसलिए। क्यों भइया? क्यों आपने गरीब प्रवासियों को न्यौता नहीं दिया? क्यों आप सिर्फ उद्योगपतियों को ही बुलाते हैं? बार बार कहते हैं पैसा नहीं लगाना तो मत लगाओ, लेकिन अपने बच्चों को घूमने के लिए तो भेजो। पर्यटन उद्योग को चमकाना है क्या? या देश में फैले भ्रष्टाचार की नयी तस्वीर उन्हें भी दिखानी है। जो संसद से सड़क तक पसरा पड़ा है। अगर नहीं, तो क्यों बुला रहे हो गुजरात, बिहार, हरियाणा और पंजाब। पूरा देश कहिए जनाब। सभी अपनी नयी तस्वीर दिखा रहे हैं। लेकिन याद भी दिलाते हैं कि पैसा ना लगाना हो मत लगाओ, लेकिन घूमने तो चलो। ये अजीब जबरदस्ती है। अगर कोई घूमना चाहेगा तो अपने आप आएगा, इतना गिड़गिड़ाना क्यों है भाई? जिनने देश छोड़ दिया, जबरदस्ती उन्हें जड़ों से जोड़े रखने की जिद है। अरे, जो यहां हैं उन्हें तो बचा लो।

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

कौन बचा रहा है संसद की गरिमा

संसद के हमले की नौंवी बरसी। नौ साल पहले आज के ही दिन हुआ था देश की संसद पर हमला। देश की गरिमा को तार तार करने की कोशिश हुई थी। आतंकवादी संसद तक पहुंच भी गये थे, लेकिन हमारे जवानों ने जान की बाजी लगाकर उन्हें नेस्तनाबूद कर दिया था। इस कार्रवाही में आठ जवान शहीद हो गये थे। हर साल की तरह इस बार भी संसद परिसर में शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी गई। सभी राजनैतिक दल आतंकवाद के खिलाफ एकजुट दिखाई दिये। मानों कह रहे हों, हम साथ साथ हैं। और हमारा ये साथ कभी नहीं छूटने वाला है। जब सभी राजनीतिक दल एकजुटता दिखा रहे थे तब समय हुआ था दस बज कर पैंतालिस मिनट। करीब दस मिनट तक चला श्रद्धांजलि कार्यक्रम... इसके बाद फिर सभी माननीय सदस्य बढ़ चले सदन की तरफ। अब समय हुआ था.... ग्यारह बजकर दो मिनट। सदन के बाहर जो माननीय सदस्य एक साथ दिख रहे थे, वे हंगामा करने लगे। सदन की कार्यवाही में बाधा डालने लगे, जो शीतकालीन सत्र के शुरू होने के बाद से एक दिन भी नहीं चल पाई है। लेकिन इसकी फिक्र किसे है। बाहर साथ साथ थे, लेकिन सदन में जैसे एक दूसरे से मतलब ही नहीं है। जिस संसद की गरिमा बचाने के लिए आठ जाबांज शहीद हो गये थे, उसी संसद की गरिमा को अपने ही लोग लहूलुहान करने में लगे हैं... क्या अच्छा नहीं होता... कि जैसी एकजुटता इन लोगों ने आतंकवाद के खिलाफ दिखाई, वैसी ही भ्रष्टाचार के खिलाफ भी दिखाते।

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

मुन्नी बदनाम हुई...

पिछले महीने एक गाना लोगों की जुबां पर चढ़ बैठा। मुन्नी बदनाम हुई, डार्लिंग तेरे लिए। मुन्नी कुछ इस तरह बदनाम हुई कि सिर्फ देष में नहीं, बल्कि पाकिस्तान में भी ‘मुन्नियों’ के लिए घर से निकलना जी का जंजाल बन गया। जिधर जातीं, बदनामी पहले ही पहुंच जाती। लेकिन भैया जी कहते हैं, बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा। लगता है भैया जी की बात सुनी जा रही है। आजकल भ्रश्टाचार का बोलबाला है। लोकतंत्र के चारों स्तंभ किसी न किसी तरह से इसके षिकार हैं। भ्रश्टाचार की चर्चा सरेआम है। हर वो आदमी इसकी चर्चा कर रहा है, जो खुद भी भ्रश्ट है! अगर भ्रश्ट नहीं है तो मौके की फिराक में है। बस, एक बार की चाहत है, उसके बाद जरूरत ही नहीं पड़ेगी। रोज नये खुलासे। चाहे क्रिकेट का खेल हो या फिर राजनीति का। सबकुछ बिक रहा है। जमीर की तो कीमत सबसे ज्यादा है। सस्ता नहीं बिकता! जब तक लाखों करोड की बात ना हो, इसका बिकना नामुमकिन है। अपने मुलायम सिंह यादव को ही देखिए। बताया जा रहा है कि मुलायम सिंह उतने मुलायम नहीं हैं, जितने दिखते हैं। तभी तो गरीबों के हक का दो लाख करोड़ का अनाज डकार गये, और भनक तक नहीं लगने दी। वो तो लालू यादव थे जो महज नौ हजार करोड रूपये का चारा चुपचाप नहीं पचा सके। आखिर जानवरों का था, हजम भी कैसे होता। लेकिन कहते हैं ना, ज्यादा खाओ तो अपच हो जाता है, वैसा ही मुलायम सिंह के साथ होता दिख रहा है। घोटालेबाजों के पास घोटालों का पूरा इतिहास भी है। कहते हैं आजाद भारत में पहला घोटाला जीप घोटाला था, जाहिर है, तब हम इतने आधुनिक नहीं थे। और जीप भी महंगी सवारी ही थी। इतना ही नहीं, करने वालों ने तो साइकिल आयात के नाम पर भी घोटाला किया था। ऐसा नहीं है कि घोटाला सिर्फ नेताओं की बपौती है। अब तो सभी घोटाला कर रहे हैं। पहुंच-पहुंच की बात है। जिसके हाथ जितने लंबे हैं, वो उतना बड़ा घोटाला कर सकता है। बस आप कुछ भी हों, आम आदमी ना हों, नही ंतो आपके जिम्मे बिजली चोरी या कर चोरी जैसी छोटी चोरियां ही आएंगी, क्योंकि मोटी चोरी पर तो उनका एकाधिकार है, जो किसी न किसी तरह से रसूख वाले हैं। ये अलग बात है कि पिछले कुछ महीनों से केंद्र सरकार के मंत्री घोटालों को लेकर उतने बदनाम हो गये हैं जितनी बदनाम झंडू बाम लगाने वाली मुन्नी भी ना हुई।