संसद के हमले की नौंवी बरसी। नौ साल पहले आज के ही दिन हुआ था देश की संसद पर हमला। देश की गरिमा को तार तार करने की कोशिश हुई थी। आतंकवादी संसद तक पहुंच भी गये थे, लेकिन हमारे जवानों ने जान की बाजी लगाकर उन्हें नेस्तनाबूद कर दिया था। इस कार्रवाही में आठ जवान शहीद हो गये थे। हर साल की तरह इस बार भी संसद परिसर में शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी गई। सभी राजनैतिक दल आतंकवाद के खिलाफ एकजुट दिखाई दिये। मानों कह रहे हों, हम साथ साथ हैं। और हमारा ये साथ कभी नहीं छूटने वाला है। जब सभी राजनीतिक दल एकजुटता दिखा रहे थे तब समय हुआ था दस बज कर पैंतालिस मिनट। करीब दस मिनट तक चला श्रद्धांजलि कार्यक्रम... इसके बाद फिर सभी माननीय सदस्य बढ़ चले सदन की तरफ। अब समय हुआ था.... ग्यारह बजकर दो मिनट। सदन के बाहर जो माननीय सदस्य एक साथ दिख रहे थे, वे हंगामा करने लगे। सदन की कार्यवाही में बाधा डालने लगे, जो शीतकालीन सत्र के शुरू होने के बाद से एक दिन भी नहीं चल पाई है। लेकिन इसकी फिक्र किसे है। बाहर साथ साथ थे, लेकिन सदन में जैसे एक दूसरे से मतलब ही नहीं है। जिस संसद की गरिमा बचाने के लिए आठ जाबांज शहीद हो गये थे, उसी संसद की गरिमा को अपने ही लोग लहूलुहान करने में लगे हैं... क्या अच्छा नहीं होता... कि जैसी एकजुटता इन लोगों ने आतंकवाद के खिलाफ दिखाई, वैसी ही भ्रष्टाचार के खिलाफ भी दिखाते।
कई बार कुछ बातें सिर्फ़ कहने के लिए कही जाती है,जिनका कोई मतलब नहीं होता। लेकिन कई बार कुछ बातों का नही होते हुए भी मतलब होता है।
सोमवार, 13 दिसंबर 2010
गुरुवार, 9 दिसंबर 2010
मुन्नी बदनाम हुई...
पिछले महीने एक गाना लोगों की जुबां पर चढ़ बैठा। मुन्नी बदनाम हुई, डार्लिंग तेरे लिए। मुन्नी कुछ इस तरह बदनाम हुई कि सिर्फ देष में नहीं, बल्कि पाकिस्तान में भी ‘मुन्नियों’ के लिए घर से निकलना जी का जंजाल बन गया। जिधर जातीं, बदनामी पहले ही पहुंच जाती। लेकिन भैया जी कहते हैं, बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा। लगता है भैया जी की बात सुनी जा रही है।
आजकल भ्रश्टाचार का बोलबाला है। लोकतंत्र के चारों स्तंभ किसी न किसी तरह से इसके षिकार हैं। भ्रश्टाचार की चर्चा सरेआम है। हर वो आदमी इसकी चर्चा कर रहा है, जो खुद भी भ्रश्ट है! अगर भ्रश्ट नहीं है तो मौके की फिराक में है। बस, एक बार की चाहत है, उसके बाद जरूरत ही नहीं पड़ेगी। रोज नये खुलासे। चाहे क्रिकेट का खेल हो या फिर राजनीति का। सबकुछ बिक रहा है। जमीर की तो कीमत सबसे ज्यादा है। सस्ता नहीं बिकता! जब तक लाखों करोड की बात ना हो, इसका बिकना नामुमकिन है। अपने मुलायम सिंह यादव को ही देखिए। बताया जा रहा है कि मुलायम सिंह उतने मुलायम नहीं हैं, जितने दिखते हैं। तभी तो गरीबों के हक का दो लाख करोड़ का अनाज डकार गये, और भनक तक नहीं लगने दी। वो तो लालू यादव थे जो महज नौ हजार करोड रूपये का चारा चुपचाप नहीं पचा सके। आखिर जानवरों का था, हजम भी कैसे होता। लेकिन कहते हैं ना, ज्यादा खाओ तो अपच हो जाता है, वैसा ही मुलायम सिंह के साथ होता दिख रहा है।
घोटालेबाजों के पास घोटालों का पूरा इतिहास भी है। कहते हैं आजाद भारत में पहला घोटाला जीप घोटाला था, जाहिर है, तब हम इतने आधुनिक नहीं थे। और जीप भी महंगी सवारी ही थी। इतना ही नहीं, करने वालों ने तो साइकिल आयात के नाम पर भी घोटाला किया था।
ऐसा नहीं है कि घोटाला सिर्फ नेताओं की बपौती है। अब तो सभी घोटाला कर रहे हैं। पहुंच-पहुंच की बात है। जिसके हाथ जितने लंबे हैं, वो उतना बड़ा घोटाला कर सकता है। बस आप कुछ भी हों, आम आदमी ना हों, नही ंतो आपके जिम्मे बिजली चोरी या कर चोरी जैसी छोटी चोरियां ही आएंगी, क्योंकि मोटी चोरी पर तो उनका एकाधिकार है, जो किसी न किसी तरह से रसूख वाले हैं। ये अलग बात है कि पिछले कुछ महीनों से केंद्र सरकार के मंत्री घोटालों को लेकर उतने बदनाम हो गये हैं जितनी बदनाम झंडू बाम लगाने वाली मुन्नी भी ना हुई।
सोमवार, 4 अक्टूबर 2010
दिल्ली, दुनिया और ग्रामीण संस्कृति
तीन अक्टूबर की रात, पूरी दुनिया ने दिल्ली को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनते हुए देखा। दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स की ओपनिंग सेरेमनी में दुनिया ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति की झलक देखी। हम दुनिया से बाहर नहीं, सो हम भी सरकारी टीवी पर दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय बनने के गवाह बने। राष्ट्रगीत से शुरू हुआ कार्यक्रम करीब तीन घंटे के सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और दुनिया भर से आए करीब सात हजार खिलाड़ियों की परेड के बाद ऑस्कर विजेजा अल्लारक्खा रहमान के कॉमनवेल्थ थीम सॉंग के साथ खत्म हुआ। देश के कई राज्यों से आए कलाकारों ने अपनी लोककलाओं और नृत्य का प्रस्तुतिकरण करके मन मोह लिया। लेकिन जब ट्रेन की शक्ल में झांकियां आईं तो मन खट्टा हो गया। एनांउसर कह रहा था भारत की ग्रामीण संस्कृति की झलक पेश की जा रही है। और ये सही भी था। वाकई उद्घाटन समारोह के दौरान दिखाई जाने वाली झांकियां हमारे देश की संस्कृति की ही प्रतिरूप थीं, जिनमें लोहार, मजदूर, नेता, रिक्शे वाले, सभी अपना अपना योगदान दे रहे थे। ये देखते हुए ही ख्याल आया कि जिन चीजों को हम ग्रामीण भारतीय संस्कृति कह कर दिखा रहे हैं, उन्हें ही दिल्ली से क्यों गायब कर दिया गया? क्या ये सिर्फ झांकियों में दिखाने के लिए रह गये हैं, या फिर मांज कर, चमकाकर दिखाने की चीज बन गये हैं? मन में सवाल उठा- क्यों साउथ दिल्ली की सड़कों पर रिक्शे वाले नहीं दिख रहे? झांकी देखकर खुद ही जवाब दिया- क्योंकि वे जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में आ गये हैं। अब खेलों के दौरान आने वाले मेहमान देश की ग्रामीण संस्कृति से हकीकत में भले ही रूबरू ना हो सकें, लेकिन आयोजन समिति ने स्टेडियम में ही उन्हें दिखाकर कुछ तो दिखला ही दिया। दूसरा सवाल आया- क्यों सड़क किनारे पटरी पर मेहनत करके जीवन यापन करने वालों को हटा दिया गया? क्या कॉमनवेल्थ के गरिमामयी उद्घाटन से ही उनकी रोजी रोटी चल जाएगी? इस सवाल का जवाब झांकी देखने पर नहीं मिला। क्योंकि तीन अक्टूबर को ना तो सड़क किनारे ही वे लोग दिखाई दिये, और ना ही स्टेडियम में।
‘देश की इज्जत का सवाल’ था, इसलिए मन ने कहा- चलो सब ठीक है। जाने दो। लेकिन जब ये कार्यक्रम चल रहा था तभी गांव से मां का फोन आया- हाल चाल लिया। बैकग्राउंड से बाबू जी की आवाज सुनाई दी, दिल्ली में खेल होने वाला है? मैंने मां से कहा- नेशनल टीवी चैनल पर आ रहा है, लगाकर दिखा दो। मां ने मायूसी भरा जवाब दिया- बिजली तो रात के बारह बजे आएगी। एक तरफ तो दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स का भव्य आयोजन करके देश का नाम दुनिया में बढ़ाया जा रहा है, दूसरी तरफ मेरे गांव जैसे ही हजारों लाखों गांव अंधेरे के साये में जी रहे हैं।
आज से करीब पचास साल पहले राष्ट्रकवि दिनकर ने लिखा था- ‘पूरे देश में अंधेरा और दिल्ली में उजियाला है...
जिस देश को गांवों का देश कहा जाता है, उसके गांवों की ऐसी हालत पर नेताओं की समझ पर तरस खाने को दिल करता है जिनकी हकीकत भी राष्ट्रमंडल खेलों की ग्रामीण संस्कृति की झलक दिखाने वाली झांकियों में शामिल की गयी थी।
आजादी से लेकर आज तक इस देश के गांवों की हालत नहीं सुधर सकी है, किसी चीज में सुधार आया है तो सिर्फ सेंसेक्स में, अमीरों की अमीरी में और गरीबों की गरीबों में। अमीरी भी बढ़ रही है और उसी अनुपात में गरीबी भी।
मंगलवार, 14 सितंबर 2010
हिन्दू ऐसे क्यों होते हैं?
हिन्दू ऐसे क्यों होते हैं ? इस लाइन से कुछ लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंच सकती है, लेकिन मकसद ठेस पहुंचाना नहीं है। दरअसल पिछले दिनों आई एक किताब पढ़ने के बाद मन में अनायास ही ये सवाल आया कि हिन्दू ऐसे क्यों होते हैं ? जिस किताब को पढ़ने के बाद ये ख्याल आया, वो है, ‘क्या मुसलमान ऐसे ही होते हैं?’ ये किताब खास तौर से भारतीय मुसलमानों को आधार बना कर लिखी गई है। जिसमें उनकी परेशानियों का वर्णन किया गया है। इस किताब के लेखक हैं पंकज चतुर्वेदी जो पिछले उनतीस वर्षों से पत्रकारिय लेखन कर रहे हैं।
इस समय देश में मुसलमानों की छवि को लेकर एक अलग धारणा बनी हुई है। आप चाहे जहां भी बैठे हों अगर मुसलमानों की चर्चा हुई तो आपको कई बातें एक साथ सुनने को मिलेंगी। मुसलमान आतंकवादी होते हैं। कई शादियां करके ढेर सारे बच्चे पैदा करते हैं, वे देश में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक बना देंगे। आम मुसलमान भारत को अपना देश नहीं मानता। कश्मीर की समस्या हिन्दू-मुस्लिम विवाद है। मुसलमान राष्ट्रगीत नहीं गाते। सरकार मुसलमानों का तुष्टिकरण करती है। इस तरह की बातें करने वालों में ज्यादा संख्या युवाओं की है, जिन्होंने मुसलमानों को सिर्फ और सिर्फ मीडिया के जरिए ही जाना है। इनकी अपनी कोई राय नहीं है, लेकिन टीवी में देखकर और अखबारों में पुलिसिया बयानबाजी की रिपोर्टें पढ़कर इन लोगों ने ये राय बना ली है।
पंकज चतुर्वेदी ने इन्हीं सब पर विस्तार से लिखा है। आतंकवाद फैलाने के लिए जो लोग मुसलमानों को जिम्मेदार मानते हैं और यह कहते फिरते हैं कि ‘सभी मुसलमान भले आतंकवादी ना हों, लेकिन सभी आतंकवादी मुसलमान होते हैं’ उनके लिए लेखक ने नक्सलवादियों और ‘अभिनव भारत’ की कारगुजारियों का खाका भी खींचा है। हालांकि उन्होंने साफ किया है कि ‘‘नक्सली, उत्तर-पूर्वी राज्यों या ‘अभिनव भारत’ के कुकर्मों को सामने रखने का मंतव्य यह कतई नहीं है कि कश्मीर, लश्कर या हिजबुल को मासूम सिद्ध किया जाए। गौर करने वाली बात यह है कि जब बंदूक बारूद का मिजाज एक-सा है, और उससे बहे खून का रंग एक है तो कानून व राष्ट्रवाद की परिभाषाएं अलग-अलग क्यों हैं?’’
लेखक का यह सवाल जायज भी है। क्या मजहब अलग-अलग होने से हिन्दू और मुसलमान के जुर्म की सजा अलग-अलग हो सकती है? नहीं। लेकिन यहां सजा की बात ही नहीं है। हमारे समाज में ‘हिन्दू’ अगर कहीं आतंक फैलाता है, बम फोड़ता है तो यह आतंकवादियों को करारा जवाब है, जिसे शिवसेना जैसे कुछ क्षेत्रीय दल प्रश्रय भी देते हैं, लेकिन हकीकत में हुई आतंकवादी घटनाओं के लिए भी निर्दोष मुसलमानों को निशाना बना लिया जाता है। क्योंकि वे सॉफ्ट टारगेट होते हैं। तर्क वही, जो पहले लिखा गया है।
पंकज लिखते हैं कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर पूरे देश में चौकसी बढ़ जाती है, पुलिसवाले कई (मुसलमान) आतंकवादी पकड़ते हैं, कुछ एनकाउंटर में मारे जाते हैं, कुछ भाग जाते हैं। काफी असलाह बरामद होता है, लेकिन ये कहीं जमा नहीं होता। पकड़े गये लोग जेलों में सड़ते रहते हैं और असलहे कबाड़ में। इनका कोई रिकॉर्ड नहीं है। ये काम पुलिस अपनी कमियों को ढंकने के लिए करती है, मामले बरसों चलते रहते हैं। दसियों साल तक सुनवाई नहीं होती, लेकिन सभी चुप हैं। बोलते हैं तो सिर्फ वे जो खुद को ‘देशभक्त’ कहते हैं।
लेखक ने इस किताब के जरिए बेहतरीन आंकड़े उपलब्ध कराए हैं। जिनमें हिन्दू और मुसलमानों के बीच तुलना की गई है। चाहे आबादी की बात हो या शिक्षा की, राजनीति की हो या सरकारी नौकरियों की। बात-बात में मुसलमानों में बहु शादी प्रथा पर निशाना साधने वाले कहते हैं कि मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं और जल्द ही देश के बहुसंख्यकों को पीछे छोड़ देंगे। लेकिन समाजविज्ञानी कहते हैं कि अगर मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि की यही रफ्तार रही तो भी उन्हें ‘हिन्दुओं’ के बराबर पहुंचने में 3,626 साल लगेंगे। फिर इस तरह का प्रचार क्यों किया जा रहा है ? जिन हिन्दुओं को बहुसंख्यक होने के नाते अल्पसंख्यकों से बड़े भाई सरीखा बर्ताव करना चाहिए, वे ही उन्हें परेशान करने में क्यों जुटे हैं ? जबकि उनके वोट पाने के लिए बड़े से बड़ा हिन्दूवादी नेता भी धर्मनिरपेक्षता का जामा पहनने से नहीं हिचकिचाता। पाकिस्तान जाकर जिन्ना को सेकुलर बता आता है।
लेखक ने राज्यवार आंकड़े इकट्ठे किये हैं- जिनसे साफ पता चलता है कि सरकारी नौकरियों में मुसलमान कम हैं, राजनीति में भी कम है। साक्षरता के मामले में भी वे औसत ही हैं, लेकिन उम्र बढ़ने के हिसाब से अनुपात घटता जाता है और स्नातक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते ये आंकड़ा 3 से 3.5 फीसदी के बीच रह जाता है। जबकि जेल में बंद मुस्लिम कैदियों की संख्या आनुपातिक रूप से ज्यादा है।
इस किताब को चार अध्यायों में बांटा गया है। 1.सबसे बड़ा इल्जामः बेवफाई। 2. पर्सनल लॉ। 3. ऐसी तुष्टि से तो असंतुष्टि भली। और 4. परिशिष्ट।
तीसरे अध्याय में सच्चर कमिटी की रिपोर्ट की खास बातों को संक्षेप में दिया गया है जबकि परिशिष्ट में पंडित जवाहर लाल नेहरू के एक लेख का अंश और मुंशी प्रेमचंद का भाषण शामिल किया गया है।
‘क्या मुसलमान ऐसे ही होते हैं?’ की भूमिका प्रो. विपिन चंद्रा ने लिखी है। वे लिखते हैं ‘‘यह पुस्तक देश के मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक और बौद्धिक हालत का लेखा-जोखा तो प्रस्तुत करती ही है, एक ऐसी साम्प्रदायिक सोच को बेनकाब भी करती है जो कि समूचे मुसलमानों को संदिग्धता के सवालों में घेरने का प्रयास होता है। भारत का समग्र विकास तभी सम्भव है जब यहां का प्रत्येक बाशिंदा समान रूप से तरक्की करे। ऐसे में मुल्क की उस 14 फीसदी आबादी के सामाजिक-आर्थिक तरक्की को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है जो हुनरमंद है, तरक्कीपसंद है और मुल्कपरस्त है। मुसलमान या इस्लाम ना तो भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विपरीत हैं और ना ही उन्हें कोई विशेष लाभ या तुष्टिकरण किया जा रहा है। ऐसे ही कई तथ्यों का आंकड़ों के आधार पर किया गया आकलन साम्प्रदायिक सोच से जूझने का एक सार्थक प्रयास है।’’
किताब का नामः क्या मुसलमान ऐसे ही होते हैं?
लेखकः पंकज चतुर्वेदी
मूल्यः रूपये 175
प्रकाशकः शिल्पायन,10295, लेन नं.1
वैस्ट गोरखपार्क,
शाहदरा, दिल्ली 110032
सोमवार, 30 अगस्त 2010
खाऊओं का देश
सरकारी विभाग में भ्रष्टाचार (खाने कमाने) के एक से एक तरीके हैं। एक बीडीओ ने एक तालाब बनवाया, कागज पर। इसमें उसने मजदूरी और औजारों का खर्च दिखाकर दो लाख रूपये बना लिए। उसका तबादला हो गया। उसकी जगह आए नये बीडीओ ने जब लोकेशन का मुआयना किया, तो पाया कि वहां तालाब है ही नहीं, होना भी नहीं था, वो तो बना ही कागज पर था। ऐसे में नये बीडीओ के माथे पर शिकन आ गई। वो परेशान हो गया कि अगर इसकी जांच हो गई तो वो फंस सकता है। ऐसे में उसने इसका उपाय भी खोज लिया। उसने पुराने बीडीओ के तालाब को भरवाने का आदेश दे दिया। वजह बताई कि एक ही रूका हुआ पानी गंदा हो गया है। अत: इसकी जरूरत नहीं है। उसने तालाब को भरवा दिया, कागज पर। पैसे भी बन गये, इज्जत भी बच गई।
ऐसा ही हाल लोहारीनाग पाला परियोजना के साथ भी हुआ है। अब तक 670 करोड़ रूपये खर्च किये जा चुके हैं, अब जबकि परियोजना बंद कर दी गई है, इसे समेटने में भी 800 करोड़ रूपये खर्च होने का अनुमान लगाया जा रहा है। बनाओ तो खाओ, हटाओ तो खाओ। खाने के लिए कुछ भी करेगा, क्योंकि ये खाऊओं का देश है। जिसे जहां मौका मिले, खाए जाओ, खाए जाओ... जनता देखने के सिवा कुछ नहीं कर सकती... क्योंकि सोचने की शक्ति कुंद हो चुकी है।
ऐसा ही हाल लोहारीनाग पाला परियोजना के साथ भी हुआ है। अब तक 670 करोड़ रूपये खर्च किये जा चुके हैं, अब जबकि परियोजना बंद कर दी गई है, इसे समेटने में भी 800 करोड़ रूपये खर्च होने का अनुमान लगाया जा रहा है। बनाओ तो खाओ, हटाओ तो खाओ। खाने के लिए कुछ भी करेगा, क्योंकि ये खाऊओं का देश है। जिसे जहां मौका मिले, खाए जाओ, खाए जाओ... जनता देखने के सिवा कुछ नहीं कर सकती... क्योंकि सोचने की शक्ति कुंद हो चुकी है।
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